चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर अभय ओका ने उठाए सवाल, राजनीतिक प्रभाव से मुक्ति की मांग
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओका ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने के लिए मजबूत कानूनी व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई है। महाराष्ट्र के ठाणे में रविवार को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और हम’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं। इसलिए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में किसी राजनीतिक दल या सरकार का वर्चस्व नहीं होना चाहिए।
जस्टिस ओका ने सवाल उठाया कि यदि ज्ञानेश कुमार जैसे किसी चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जाता है, तो उसके बाद क्या होगा। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जो चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता और स्वायत्तता की रक्षा कर सके। उन्होंने पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के उस प्रस्ताव का भी उल्लेख किया, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी व्यवस्था बनाने की बात कही गई थी। इस प्रस्ताव में प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने का विचार था।
जस्टिस ओका ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए नागरिकों को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। किसी विचार या तर्क का जवाब दूसरे तर्क से दिया जाना चाहिए, न कि शारीरिक बल से। उनके अनुसार, नागरिकों को सार्वजनिक नीतियों और सरकारी परियोजनाओं पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है।
व्याख्यान के दौरान उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी चिंता जताई। ओका ने ठाणे और मुंबई में बढ़ते तापमान तथा विकास परियोजनाओं के लिए पेड़ों की कटाई का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरणीय नुकसान का असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत बताई और कहा कि वैज्ञानिक सोच का अर्थ धर्म का विरोध करना नहीं है।
ठाणे की प्रस्तावित सर्कुलर मेट्रो परियोजना का जिक्र करते हुए उन्होंने इसकी लागत और विकल्पों पर सवाल उठाने के नागरिकों के अधिकार की बात कही। उन्होंने सुझाव दिया कि सड़कों की व्यवस्था बेहतर बनाने और सार्वजनिक परिवहन में बसों की संख्या बढ़ाने जैसे विकल्पों की लागत और प्रभाव का भी आकलन किया जाना चाहिए।
जस्टिस ओका की टिप्पणियों में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और नागरिकों को शासन तथा विकास परियोजनाओं पर सवाल पूछने का अवसर मिलना चाहिए।
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