मोदी की दाल गल नहीं रही, इसलिए रोज नया अभियान?
राजेन्द्र सिंह जादौन
नरेंद्र दामोदरदास मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने पर भारतीय जनता पार्टी ने 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ शुरू किया है। पार्टी के अनुसार, इस अभियान के तहत सेवा, जनभागीदारी, सुशासन और विकसित भारत से जुड़े कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। 7 अक्टूबर को ‘सेवा ज्योति कलश यात्रा’ समेत देशभर में विभिन्न कार्यक्रम प्रस्तावित हैं।
लेकिन इस पूरे अभियान को लेकर एक बुनियादी सवाल उठता है—क्या जनता की सेवा के लिए बार-बार नए अभियान की जरूरत पड़नी चाहिए? कभी सेवा, कभी संकल्प, कभी ज्योति, कभी यात्रा, कभी आशीर्वाद, कभी संवाद और कभी विकसित भारत। सवाल यह है कि देश लगातार अभियानों की श्रृंखला से आगे बढ़ रहा है या ऐसी व्यवस्था की ओर, जहां सामान्य प्रशासन ही नागरिकों की समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हो।
‘सेवा संकल्प अभियान’ में रक्तदान, पौधारोपण, स्वास्थ्य शिविर, आंगनवाड़ी से जुड़े कार्यक्रम, लाभार्थियों से संपर्क और सरकारी योजनाओं की जानकारी जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। पार्टी ने ‘सेवा सेतु’, ‘नमो सेवा’ और ‘वडनगर-वाराणसी’ से जुड़ी यात्राओं सहित कई कार्यक्रमों की रूपरेखा भी तैयार की है।
सवाल यह नहीं है कि रक्तदान क्यों हो रहा है, पौधारोपण क्यों हो रहा है या स्वास्थ्य शिविर क्यों लगाए जा रहे हैं। ये सभी सामाजिक रूप से उपयोगी गतिविधियां हैं। सवाल यह है कि अगर गरीब को इलाज, किसान को योजना, बुजुर्ग को पेंशन, मजदूर को सुविधा और युवा को रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए हर बार किसी विशेष अभियान या शिविर का इंतजार करना पड़े, तो सामान्य प्रशासन की भूमिका क्या रह जाती है?
सेवा का सबसे बड़ा प्रमाण पोस्टर नहीं, परिणाम होता है। फोटो नहीं, सुविधा होती है। मंच नहीं, समाधान होता है। अगर सरकारी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नियमित प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से पहुंच रहा है, तो उसे किसी विशेष अभियान की जरूरत नहीं होनी चाहिए। सरकारी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें नागरिक को अपनी समस्या लेकर बार-बार दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें और उसे किसी राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल हुए बिना भी अपने अधिकार मिल सकें।
भारतीय जनता पार्टी और सरकार समर्थक इन कार्यक्रमों को जनभागीदारी और सेवा की राजनीति के रूप में देख सकते हैं। इसमें भी कोई आपत्ति नहीं कि समाज के लिए उपयोगी गतिविधियां हों। लेकिन जब ऐसी गतिविधियों को किसी एक राजनीतिक नेता के 25 वर्ष के सार्वजनिक जीवन के उत्सव से जोड़ा जाता है, तब लोकतंत्र में सवाल उठना स्वाभाविक है। सेवा अगर वास्तव में सेवा है, तो उसका केंद्र किसी व्यक्ति का चेहरा नहीं, बल्कि नागरिक और उसका जीवन होना चाहिए।
‘वडनगर से वाराणसी’ तक की यात्राएं प्रधानमंत्री के राजनीतिक सफर और उनके दो महत्वपूर्ण पड़ावों को जोड़ने का संदेश देती हैं। लेकिन जनता का सवाल इससे आगे का है। उसे ऐसी विकास यात्रा चाहिए जिसमें गांव का गरीब, किसान, मजदूर और युवा बिना किसी राजनीतिक नारे के आगे बढ़ सके। उसे यह जानने में ज्यादा दिलचस्पी है कि उसके घर में पानी आया या नहीं, अस्पताल में डॉक्टर मिला या नहीं, स्कूल में शिक्षक पहुंचा या नहीं और युवा को रोजगार मिला या नहीं।
पिछले कुछ वर्षों में अभियान राजनीति का एक प्रमुख माध्यम बन गए हैं। कोई समस्या उठी तो अभियान, कोई उपलब्धि बतानी हुई तो अभियान, कोई विशेष अवसर आया तो अभियान और राजनीतिक संदेश देना हुआ तो फिर अभियान। ऐसे में नागरिक के लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि कौन-सा अभियान वास्तविक प्रशासनिक जरूरत का हिस्सा है और कौन-सा राजनीतिक संचार का माध्यम।
प्रधानमंत्री के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पड़ाव हैं और उनके समर्थकों को इसे मनाने का अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र में उपलब्धि का उत्सव तभी सार्थक माना जा सकता है, जब उसके साथ सवाल पूछने की स्वतंत्रता भी बनी रहे। 25 वर्षों का आकलन केवल अभियानों, यात्राओं और कार्यक्रमों की संख्या से नहीं, बल्कि उन समस्याओं के आधार पर भी होना चाहिए जो इस अवधि में हल हुईं।
सरकार का मूल्यांकन नारों और कार्यक्रमों की संख्या से नहीं होता। जनता देखती है कि उसके घर में पानी पहुंचा या नहीं, अस्पताल में इलाज मिला या नहीं, स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता सुधरी या नहीं, किसान को उचित मूल्य मिला या नहीं, युवा को रोजगार मिला या नहीं और भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई हुई या नहीं। यही वे परिणाम हैं जो किसी भी सरकार के कामकाज की वास्तविक तस्वीर सामने रखते हैं।
आज जरूरत शायद एक और अभियान की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की है जिसे लगातार अभियानों के सहारे चलाने की आवश्यकता न पड़े। ऐसी व्यवस्था, जहां सरकारी अधिकारी नागरिक की समस्या सुनने के लिए किसी विशेष मंच का इंतजार न करे, गरीब को योजना का लाभ लेने के लिए किसी नेता के साथ तस्वीर खिंचवाने की जरूरत न हो और युवा को रोजगार की जानकारी के लिए किसी सम्मेलन का इंतजार न करना पड़े।
सेवा की असली ज्योति तब जलेगी जब सरकारी दफ्तर में बिना सिफारिश काम होगा। सुशासन तब दिखाई देगा जब नागरिक को अपने अधिकार के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा। सेवा संकल्प तब सार्थक होगा जब सरकार जनता के सवालों का जवाब देगी और योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नियमित व्यवस्था के जरिए पहुंचेगा।
इसलिए सवाल किसी व्यक्ति विशेष से ज्यादा उस राजनीतिक शैली से है जिसमें हर उपलब्धि के लिए एक नया अभियान और हर अभियान के लिए एक नया नाम सामने आता है। देश को ऐसी रोशनी की जरूरत है जो बेरोजगार युवा के भविष्य में जले, किसान के खेत में जले, गरीब के घर में जले और सरकारी व्यवस्था के अंधेरे को दूर करे।
मोदी के 25 वर्ष पूरे हुए हैं तो उपलब्धियां गिनाई जानी चाहिए, जश्न भी मनाया जा सकता है। लेकिन जनता को भी अपनी गिनती करने दीजिए। वह देखेगी कि कितने अभियान आए, कितने संकल्प लिए गए और जमीन पर कितना बदलाव हुआ। क्योंकि राजनीति में केवल तड़का लगाने से दाल नहीं गलती—उसके लिए पानी, आग और वक्त तीनों चाहिए। अब जनता का सवाल यही है कि अभियान बहुत हो गए, परिणाम कब दिखाई देंगे?
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)