सड़कों पर छात्र, जेन-जी, विपक्ष और जनता के आंदोलन का कारण है राष्ट्रपति की कामचोरी
शैलेन्द्र कुमार बिराणी
भारत या इंडिया में हर तरफ आंदोलन हो रहे हैं और छात्र, जेन-जी, जेन-अल्फा, विपक्ष और जनता किसी न किसी मुद्दे को लेकर सड़कों पर है। यह सब अब एक सत्याग्रह कार्यक्रम के नाम से भी एक साथ संकलित हो रहे हैं। इससे देश की सभी समस्याएं एकजुट हो रही हैं। इन सभी समस्याओं की मूल जड़ भारत के राष्ट्रपति की कामचोरी है। इसमें गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, पेपर लीक, रिश्वतखोरी, स्वास्थ्य सुरक्षा, दयनीय शैक्षणिक व्यवस्था, महंगाई, समय पर न्याय न मिलना, पदासीन लोगों की जवाबदेही इत्यादि-इत्यादि के साथ वोट चोरी का मुद्दा सबसे ऊपर है।
वोट चोरी पर देर-सवेर जनता के दबाव से मुख्य चुनाव आयुक्त पद छोड़ देंगे या हटा दिए जाएंगे, तब भी विवाद खत्म न होकर पहले से कई गुना बड़ा हो जाएगा। इसमें कहीं राज्य सरकारों के साथ तथाकथित केंद्र सरकार की भी जाने की नौबत आ सकती है। इसके साथ उच्चतम न्यायालय की चुप्पी और समय बर्बाद करने की प्रणाली व न्याय में देरी उसे भी आंदोलनकारियों के आक्रोश का शिकार बना सकती है।
इन सभी समस्याओं के विरोध में कहीं पर भी दबाव में या जानबूझकर हिंसा भड़की तो देश गृहयुद्ध के दलदल में फंस जाएगा। इसके पीछे भी राष्ट्रपति ही मूल दोषी होंगे। नए मुख्य चुनाव आयुक्त आ जाएं, दोबारा चुनाव हो जाए और नई सरकार गठित हो जाए, तब भी कुछ नहीं बदलेगा और परिस्थितियां बद से बदतर होती चली जाएंगी। इसका प्रमुख कारण है व्यवस्था यानी सिस्टम का समय और परिस्थितियों के अनुरूप नहीं होना। संसद के माध्यम से संविधान में कहीं संशोधन हुए, परंतु वे आपस में सभी संवैधानिक नियमों व कानूनों के साथ व्यवस्थित नहीं हुए। इसलिए वे उल्टा संविधान को बिखरने का काम कर रहे हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण संसद द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को राष्ट्रपति से भी अधिक अधिकार व शक्तियां दे देना है, जिसके तहत सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन पर कार्य के कारण मामला दर्ज नहीं होना है। संविधान इसकी अनुमति नहीं देता तो राष्ट्रपति ने कानून पर हस्ताक्षर क्यों किए? संविधान संरक्षक राष्ट्रपति और उच्चतम न्यायालय की फुल बेंच, संविधान पीठ, जिसे भी संविधान संरक्षक का दर्जा दिया गया है, वे चुप क्यों बैठे रहे?
इन सभी समस्याओं का समय से पहले उपाय महामहिम राष्ट्रपति महोदय को 2011 में ही विधिवत रूप से भेज दिया गया था। इसकी आधिकारिक प्रति, हस्ताक्षर व मोहर के साथ हमारे पास है। कहीं कानूनी प्रक्रियाओं के बाद अंतिम फैसला लेने के लिए राष्ट्रपति संविधान के अनुरूप अधिकृत हो गए। इसमें दुनिया में पहली बार किसी संविधान का बना ग्राफिक्स रूप का एक प्रारूप था, जबकि पूरा ग्राफिक्स व डिजिटल रूप जनता के माध्यम से बनना था। इस ग्राफिक्स के सारे आधारों का प्रमाण भी प्रस्तुत कराया था। यह भारतीय संविधान की मूल भावना और आधार को जैसा है, वैसा बनाए रखने पर टिका था।
इसमें जहां कानून, नियम और व्यवस्था स्पष्ट नहीं थी, उन्हें भी संविधान के अनुरूप स्पष्ट करना था। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन, भारत सरकार की संवैधानिक व्याख्या का धरातल पर रूपांतरण, भारतीय मीडिया का संवैधानिक अधिकार व कानूनी जवाबदेही, भारत के मुख्य न्यायाधीश के संवैधानिक पद का संविधान के अनुसार सार्वजनिक सम्मान, कानून बनाने की स्पष्टता इत्यादि शामिल थे। इन सभी को साइंटिफिक-एनालिसिस के टैग के जरिये हम मीडिया के माध्यम से देशवासियों के सामने रखते आ रहे हैं। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन और मुख्य चुनाव आयुक्त को राष्ट्रपति से अधिक स्वतंत्रता देने जैसा असंवैधानिक कानून भविष्य में न बन पाए, यह भी शामिल है। यह सभी राष्ट्रपति और उच्चतम न्यायालय को कभी का भेज दिया गया है। इसके पश्चात भी राष्ट्रपति ने अंतिम फैसला नहीं किया और उच्चतम न्यायालय ने भी कुछ नहीं करके समय को बर्बाद किया और अब देश को भविष्य में ही नहीं, वर्तमान में भी संकटों में धकेल दिया है। अब तो पानी गले तक आ गया है, यानी लोकतंत्र के खत्म होने की दहलीज आ गई है।
वर्तमान आंदोलन और सड़कों पर विरोध करना पुराने समय का तरीका है। इससे लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, परंतु आपसी टकराव, जनहानि, मारपीट, कानूनी अत्याचार व दमन का खतरा बहुत ज्यादा है। इससे आगे आज के समय के अनुरूप एक विशेष तरीका है, जो सभी समस्याओं को बिना किसी टकराव व मानवीय नुकसान के जड़ से खत्म करता है। यह संविधान की बात करना, उसकी दुहाई देना, संविधान की किताब दिखाने से आगे संविधान की किताब आंदोलन स्थलों पर खोलने से है और उसके पन्नों में लिखे स्वर्णिम अक्षरों को ग्राफिक्स रूप में अभिव्यक्त करके उसे एआई युग के समानांतर बनाना है।
इसकी पूरी रूपरेखा तैयार है, बस सिर्फ शुरुआत करना है। इसके आगे बढ़ने के साथ-साथ समस्याएं खत्म होती जाएंगी और जो गलत तरीके, ताकत व बाहुबल के दम पर कानूनी आड़ में संवैधानिक पदों पर बैठे हैं, वे हटते जाएंगे। इसके लिए राष्ट्रपति समय बर्बाद कर कामचोरी करते हुए जवाबदेही न निभाएं और फैसला न लें, तब भी फर्क नहीं पड़ता है।
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