कपिल सिब्बल ने लोकतंत्र पर जताई चिंता, बोले- न्यायपालिका और मीडिया की भूमिका पर गंभीर सवाल
नई दिल्ली। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने प्रेम भाटिया मेमोरियल लेक्चर में भारत में लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और प्रेस का प्रमुख दायित्व नागरिकों को सत्ता के दुरुपयोग और बहुमत के दबाव से बचाना है। जब संस्थाएं अपनी भूमिका से पीछे हटने लगती हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था भीतर से कमजोर होती है।
न्यायपालिका के संदर्भ में सिब्बल ने उमर खालिद की लंबे समय से चली आ रही प्री-ट्रायल हिरासत, यूएपीए और पीएमएलए जैसे कानूनों में जमानत की कठिन शर्तों तथा कॉलेजियम व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को मुकदमा शुरू होने से पहले लंबे समय तक जेल में रखना न्याय और सजा के बीच के अंतर को धुंधला करता है।
सिब्बल ने न्यायिक स्वतंत्रता से जुड़े सवालों पर भी चिंता व्यक्त की। उनका सवाल था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुधार की जरूरत होने पर क्या न्यायपालिका हर मुद्दे को केवल संसद पर छोड़ सकती है, खासकर तब जब राजनीतिक वर्ग मौजूदा व्यवस्था से लाभान्वित हो रहा हो।
मीडिया की भूमिका पर भी उन्होंने तीखी टिप्पणी की। सिब्बल के अनुसार, कभी लोकतंत्र का ‘वॉचडॉग’ माना जाने वाला प्रेस का एक बड़ा हिस्सा अब सत्ता के नैरेटिव को आगे बढ़ाता दिखाई देता है। उन्होंने पत्रकारों के खिलाफ मुकदमों, आलोचनात्मक रिपोर्टिंग पर दबाव, पत्रकारों के ऑनलाइन और शारीरिक उत्पीड़न तथा मीडिया स्वामित्व और राजनीतिक सत्ता के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब पत्रकार सत्ता से सवाल पूछ सकें, अदालतें नागरिक अधिकारों की रक्षा करें और लोकतांत्रिक संस्थाएं अपनी आलोचना को स्वीकार करने का साहस रखें।
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