श्रीलंकाई नागरिक की जमानत बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की केंद्र की अपील
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोपी श्रीलंकाई नागरिक मोहम्मद रिफास उर्फ मोहम्मद रिगबास की जमानत बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के भारतीय नागरिक न होने के आधार पर ही उसे जमानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता। अभियोजन पक्ष को यह भी साबित करना होगा कि उसने भारत में प्रवेश अनधिकृत या अवैध तरीके से किया था।
यह मामला तमिलनाडु में यूएपीए के तहत दर्ज एक मामले से जुड़ा है। जांच एजेंसी का आरोप था कि रिफास श्रीलंकाई नागरिक हैं और उन्होंने भारत में रहने के दौरान अपनी राष्ट्रीयता छिपाई। एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और राशन कार्ड सहित भारतीय पहचान संबंधी दस्तावेज हासिल किए थे। हालांकि, अदालत के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या उनकी कथित विदेशी नागरिकता के आधार पर पहले मिली जमानत रद्द की जा सकती है।
रिफास को जुलाई 2018 में निर्धारित समयसीमा के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं किए जाने के कारण वैधानिक जमानत मिली थी। बाद में विशेष अदालत ने जुलाई 2022 में उनकी जमानत रद्द कर दी। इसके खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट ने दिसंबर 2023 में फैसला सुनाते हुए विशेष अदालत का आदेश निरस्त कर दिया था। केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूएपीए की धारा 43डी(7) के तहत विदेशी नागरिक को जमानत देने पर रोक लागू करने के लिए अभियोजन पक्ष को यह दिखाना होगा कि आरोपी यूएपीए के तहत अपराध का सामना कर रहा है, वह भारतीय नागरिक नहीं है और भारत में उसका शुरुआती प्रवेश अनधिकृत या अवैध था। अदालत के अनुसार, इन शर्तों को एक साथ पूरा होना आवश्यक है।
पीठ ने कहा कि उपलब्ध सामग्री से यह प्रथम दृष्टया साबित नहीं हुआ कि रिफास ने भारत में प्रवेश करते समय कानून का उल्लंघन किया था। रिकॉर्ड में यह आरोप था कि वह वैध वीजा पर भारत आए थे और वीजा की अवधि समाप्त होने के बाद उनका रहना अवैध हुआ। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में वीजा की अवधि समाप्त हो जाना अपने आप में शुरुआती प्रवेश को अवैध नहीं बना देता और इस आधार पर यूएपीए की धारा 43डी(7) के तहत जमानत पर रोक लागू नहीं की जा सकती।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कानून में निर्धारित सभी शर्तें पूरी होती हैं, तो विदेशी नागरिक को जमानत देने के लिए बेहद असाधारण परिस्थितियां होनी चाहिए और अदालत को इसके कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे। इस मामले में केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
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