जन गण मन या वंदे मातरम? मुकेश खन्ना के बयान से फिर गरमाई राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत की बहस
नई दिल्ली। अभिनेता मुकेश खन्ना के एक बयान के बाद भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर पुरानी बहस एक बार फिर चर्चा में आ गई है। खन्ना ने कहा कि भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बजाय ‘वंदे मातरम’ होना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि ‘जन गण मन’ ब्रिटिश राजशाही के सम्मान में लिखा गया था, जबकि ‘वंदे मातरम’ स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रभक्ति का प्रमुख प्रतीक रहा है।
खन्ना के बयान के बाद सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। हालांकि, इस विवाद को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक संदर्भ को देखना जरूरी है।
‘जन गण मन’ से जुड़ा विवाद वर्ष 1911 से जुड़ा है। दिसंबर 1911 में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम भारत आए थे। इसी दौरान 27 दिसंबर को कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर की रचना ‘भारतो भाग्य विधाता’ का सार्वजनिक गायन हुआ। बाद में इसी रचना का पहला अंतरा भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के रूप में स्वीकार किया गया।
राजा जॉर्ज पंचम की भारत यात्रा और गीत के सार्वजनिक गायन का समय लगभग एक ही होने के कारण उस दौर में कुछ अंग्रेजी समाचार पत्रों ने इसे ब्रिटिश सम्राट के सम्मान में लिखा गया गीत बताया। इसी से ‘जन गण मन’ को लेकर विवाद की शुरुआत हुई।
हालांकि, रवींद्रनाथ टैगोर ने बाद में स्वयं इन दावों को खारिज किया था। 1937 में अपने मित्र पुलिन बिहारी सेन को लिखे पत्र में टैगोर ने स्पष्ट किया कि गीत का ‘भाग्य विधाता’ किसी ब्रिटिश सम्राट को नहीं कहा गया था। उन्होंने इस बात से इनकार किया कि उन्होंने जॉर्ज पंचम की प्रशंसा में गीत लिखा था। 1939 में भी टैगोर ने इस संबंध में अपनी स्थिति स्पष्ट की और ऐसे दावे को अपनी रचना और विचारों की गलत व्याख्या बताया।
दूसरी ओर, ‘वंदे मातरम’ का स्वतंत्रता आंदोलन में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रहा है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल था और 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान यह आजादी की लड़ाई का प्रमुख प्रतीक बन गया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जुलूसों और राजनीतिक आंदोलनों में ‘वंदे मातरम’ व्यापक रूप से गाया जाता था।
हालांकि, ‘वंदे मातरम’ के बाद के अंतरों में भारत माता को देवी के विभिन्न रूपों में चित्रित किए जाने के कारण उस समय कुछ मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने आपत्ति जताई थी। इसी वजह से स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह सवाल उठा कि राष्ट्रीय कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ और ‘जन गण मन’ में से किसे प्रमुख स्थान दिया जाए।
आखिरकार 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इस बहस को समाप्त करते हुए ‘जन गण मन’ को भारत का राष्ट्रगान स्वीकार किया। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने यह भी स्पष्ट किया था कि ‘वंदे मातरम’ को स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी ऐतिहासिक भूमिका के कारण समान सम्मान दिया जाएगा और इसे राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त रहेगा।
रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन के कई प्रसंग भी इस बहस में महत्वपूर्ण हैं। 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई ‘नाइटहुड’ की उपाधि वापस कर दी थी। उन्होंने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड को पत्र लिखकर ब्रिटिश सम्मान स्वीकार करने से इनकार किया था।
टैगोर को महात्मा गांधी ‘गुरुदेव’ कहते थे। उन्हें 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला और वह यह सम्मान पाने वाले पहले एशियाई साहित्यकार बने। उनके साहित्य और विचारों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक प्रशंसा हुई।
टैगोर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संबंध भी इस ऐतिहासिक बहस में विशेष महत्व रखते हैं। 1939 में बोस के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद टैगोर ने उन्हें ‘देशनायक’ कहकर संबोधित किया था। 1941 में टैगोर के निधन पर नेताजी ने उन्हें भारत के महान कवि और ऋषि के रूप में श्रद्धांजलि दी थी।
एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद हिंद सरकार ने ‘शुभ सुख चैन’ को अपना राष्ट्रगान बनाया था, जिसकी धुन रवींद्रनाथ टैगोर की रचना ‘भारतो भाग्य विधाता’ से जुड़ी थी।
इस पूरे ऐतिहासिक संदर्भ में ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ दोनों का भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र निर्माण में अलग-अलग महत्व रहा है। मुकेश खन्ना के बयान के बाद शुरू हुई बहस ने एक बार फिर इन दोनों रचनाओं के इतिहास, संवैधानिक स्थिति और राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भूमिका को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
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