गुना नगरपालिका में प्लॉट नामांतरण पर ‘बाह्य विकास शुल्क’ की मांग पर सवाल, नियम-कानून के आधार पर जवाब मांग रहे नागरिक
गुना के नगरपालिका दफ्तर में इस लाइन को नोटशीट पर लिख देना ही अघोषित नियम बन गया है। पर इस सवाल का जवाब किसी पर नहीं है कि एक प्लॉट के नामांतरण में "बाह्य विकास शुल्क" प्लॉट धारक से किस अधिनियम, नियम, उपनियम, शासनादेश या कानून की धारा के अंतर्गत मांगा जा रहा है।
दरअसल, शहर की पुरानी बस्ती महावीरपुरा में स्थित एक प्लॉट के नामांतरण की फाइल में यह टीप अंकित कर दी गई कि "बाह्य विकास शुल्क जमा कराया जाना उचित होगा।" जबकि नगरपालिका अधिनियम 1961 में प्लॉट की नामांतरण प्रक्रिया में बाह्य विकास शुल्क जमा कराने का कोई प्रावधान नहीं है।
नपा के सूत्र बताते हैं कि पुरानी बसाहट में ये लागू नहीं होता और चार साल पहले तक भी नामांतरण के समय ये शुल्क नहीं लिया जाता था। अब क्यों मांगा और लिया जा रहा है? इस सवाल का कानूनी जबाव कोई नहीं देता।
नगरपालिका अधिनियम 1961की धारा 150 में प्लॉट अथवा मकान के स्वामी के हस्तांतरण की सूचना नगरपालिका को दिए जाने तथा धारा 151 में उक्त सूचना का प्रारूप दिया गया है। नामांतरण के संबंध में विस्तृत नियम अधिसूचना दिनांक 30 अगस्त 1962, द्वारा बनाए गए हैं। जिनमें भी प्लॉट धारक से बाह्य विकास शुल्क जमा करने का कोई प्रावधान नहीं है।
ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि :-
(1) किसी प्लॉट के नामांतरण प्रकरण में प्रचलित नोटशीट पर बाद में ये टीप अंकित कर देना कि "बाह्य विकास शुल्क जमा कराया जाना उचित होगा।" क्या ऐसी टीप सद्भाविक होकर कानून का स्थान ले सकती है?
(2) क्या बाह्य विकास शुल्क के सम्बंध में अधिनियम, नियम, उपनियम, शासनादेश या कानून की धारा का उल्लेख किए बिना शुल्क प्रस्तावित करना अथवा मांगना वैध है?
(3) क्या कोई शासकीय विभाग, संस्था या निकाय किसी प्रकरण में अधिनियम, नियम, उपनियम, शासनादेश या कानून की धारा का उल्लेख किए बगैर मनमाने ढंग से कोई भी शुल्क मांग या वसूल सकता है?
इन सवालों का जबाव देने के बजाए लगातार सिर्फ यही कहा जा रहा है कि बाह्य विकास शुल्क तो जमा करना पड़ेगा। मानो तानाशाही चल रही हो कि जो कह दिया जाए वही नियम है वही कानून है। इसे लेकर कोई जवाबदेही भी नहीं है। आप दफ्तर के चक्कर लगाते रहिए, वहां के कथित जिम्मेदारों का गैर जिम्मेदाराना रवैया आपको बगावत के लिए मजबूर कर देगा।
जबकि कानून में सारी बातें स्पष्ट और सु-परिभाषित हैं। मध्यप्रदेश नगरपालिका (कॉलोनी विकास) नियम, 2021 में “बाह्य विकास कार्य” की परिभाषा नियम 2 में दी गई है। इसमें कॉलोनी की सीमा से मौजूदा शहर की सड़क तक नई सड़क, विद्युत लाइन को जोड़ना, सीवर लाइन जोड़ना तथा जलापूर्ति प्रणाली से जोड़ने जैसी बाहरी विकास गतिविधियां शामिल हैं। यह काम कॉलोनाइजर को कराना होता है प्लॉट मालिक को नहीं। इसका संदर्भ मूलतः कॉलोनी के विकास से है प्लॉट के स्वामित्व परिवर्तन या नामांतरण से नहीं है।
2021 के नियमों में कॉलोनी विकास के लिए कॉलोनाइजर की भूमिका महत्वपूर्ण है। नियम 15 में स्पष्ट है कि कॉलोनाइजर को कॉलोनी का विकास शुरू करने या प्लॉट बेचने से पहले विकास अनुमति प्राप्त करनी होती है। नियम 2(1)(g) तथा नियम 8 में बाह्य विकास शुल्क #कॉलोनाइजर से जमा कराया जाता है न कि प्लॉट मालिक से।
जबकि, नियम 23–24 में पुरानी #अनधिकृत_कॉलोनियों में नागरिक अधोसंरचना और "विकास शुल्क"; निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार संबंधित कॉलोनी के भवन/प्लॉट मालिकों/निवासियों से लिए जा सकने का प्रावधान है। यदि "विकास शुल्क" नियम 24 के अंतर्गत ली जाना है, तो इसके लिए भी संबंधित क्षेत्र को नियम 23 के अंतर्गत चिन्हित करने की अधिसूचना/सूची तथा विकास शुल्क निर्धारण का आदेश उपलब्ध कराया जाना अनिवार्य है। यहां भी मनमानी नहीं चलेगी।
लेकिन इन नियमों में भी "बाह्य विकास शुल्क" लेने का कोई प्रावधान नहीं है। विकास शुल्क नियम 2(1)(g) में और बाह्य विकास शुल्क नियम 23(7)(c) में अलग-अलग वर्णित है। ये दोनों अलग अलग शुल्क हैं। प्लॉट के नामांतरण के समय विकास शुल्क भी मनमाने ढंग से नहीं मांगा जा सकता। बाह्य विकास शुल्क मांगने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है।
हैरानी ये है कि इस मामले में शीर्ष अफसर बाबुओं और अधीनस्थों पर निर्भर हैं और अधीनस्थ कर्मचारी प्लॉट नामांतरण प्रक्रिया के दौरान बाह्य विकास शुल्क किस प्रावधान, अधिनियम, नियम, उपनियम, शासनादेश या कानून की धारा में लिया जाता है यह बताने के बजाए, "हम तो बाह्य विकास शुल्क लेते हैं..." कह कर खीसे निपोर रहे हैं।
मामला कुछ ऐसा है कि ले-देकर निराकरण भी नहीं कराया जा सकता। वरना संबंधित पक्ष परेशान होने के बजाए ऐसा भी कर चुका होता। BJP Madhya Pradesh सरकार के मुख्यमंत्री Dr Mohan Yadav जी तथा केंद्रीय मंत्री और क्षेत्र के सांसद श्रीमंत Jyotiraditya M Scindia जी मैदानी अफसरों की कार्यप्रणाली पर ध्यान देने की अत्यंत आवश्यकता है। यदि कोई शुल्क जमा कराना किसी नियम में जायज है तो वह नियम कानून आदेश बताने में परेशानी क्या है?
अभी तो ऐसा लग रहा है सब राम भरोसे चल रहा है। दफ्तरों में जनहित के, जनता के जायज और आवश्यक कामों की फाइलों को अटकाना, बिगाड़ना, घुमाना-फिराना, छुपाना, हितग्राही या पक्षकार को सही जानकारी न देना। उसे नियम कानून के सही प्रावधान न बताना, उसी से प्रश्न कर उसे परेशान करना, ये सब किस मंशा से होता है, किसी से छुपा नहीं है। सब बढ़िया है।
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