हाईकोर्ट ने पत्रकार की अधिमान्यता निरस्तीकरण पर लगाई रोक, बिना सुनवाई के आदेश को माना प्रथम दृष्टया गलत

Monday, January 19, 2026 - 17:06
Updated: 6 months ago
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हाईकोर्ट ने पत्रकार की अधिमान्यता निरस्तीकरण पर लगाई रोक, बिना सुनवाई के आदेश को माना प्रथम दृष्टया गलत

ग्वालियर (आरएनआई) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने पत्रकारिता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में प्रशासनिक कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए पत्रकार के पक्ष में बड़ी राहत दी है। माननीय न्यायमूर्ति अमित सेठ की एकलपीठ ने रंजीत लिटोरिया बनाम मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य (WP No. 41784/2025) प्रकरण में पत्रकार की मान्यता निरस्त करने वाले आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश 03 जनवरी 2025 को पारित किया गया।

मामला उस समय न्यायालय के समक्ष आया जब याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि दिनांक 06 जनवरी 2025 को पारित आदेश द्वारा उसकी पत्रकार मान्यता निरस्त कर दी गई, जबकि उसे न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सौम्या चतुर्वेदी ने न्यायालय को बताया कि जिन आपराधिक मामलों का हवाला देकर मान्यता निरस्त की गई है, वे वर्ष 2024-25 से पूर्व के हैं और इसके बावजूद प्रशासन द्वारा वर्ष 2024-25 के लिए पत्रकार की मान्यता का नवीनीकरण किया जा चुका था।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि जब एक बार मान्यता का नवीनीकरण हो चुका है, तो उसी आधार पर बिना सुनवाई के अचानक मान्यता समाप्त करना न केवल मनमाना है बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने प्रथम दृष्टया इस तर्क से सहमति जताई और माना कि कोई भी ऐसा आदेश जो किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है, उसे पारित करने से पहले सुनवाई का अवसर दिया जाना आवश्यक है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चूंकि विवादित आदेश याचिकाकर्ता के विरुद्ध है, इसलिए प्रशासन को निर्णय लेने से पहले उसे सुनने का अवसर देना चाहिए था। इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने अगली सुनवाई तक दिनांक 06/01/2025 के आदेश, जिसे याचिका में परिशिष्ट पी/1 के रूप में संलग्न किया गया है, के प्रभाव और क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।

इसके साथ ही न्यायालय ने राज्य शासन एवं अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए हैं। नोटिस आरएडी मोड के माध्यम से सात कार्य दिवसों के भीतर भेजे जाएंगे और उन्हें चार सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करना होगा। न्यायालय ने यह भी कहा है कि प्रतिवादियों को नोटिस की विधिवत सेवा हो जाने के तुरंत बाद इस प्रकरण को सूचीबद्ध किया जाए।

यह आदेश केवल एक व्यक्ति तक सीमित राहत नहीं है, बल्कि यह पूरे पत्रकार समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि पत्रकार मान्यता जैसे संवेदनशील विषय में प्रशासनिक निर्णय मनमाने ढंग से नहीं लिए जा सकते। उच्च न्यायालय ने एक बार फिर यह रेखांकित किया है कि संविधान और कानून के तहत दिए गए अधिकारों को प्रभावित करने वाले किसी भी निर्णय में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है।

अब इस मामले में अंतिम निर्णय आगामी सुनवाई के बाद होगा, लेकिन फिलहाल उच्च न्यायालय के इस आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना सुनवाई के पत्रकार की मान्यता निरस्त करना न केवल अनुचित है, बल्कि न्यायिक कसौटी पर भी टिकता नहीं है।

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