‘सुधार के नाम पर धर्म की मूल भावना से छेड़छाड़ नहीं’—सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
नई दिल्ली। Supreme Court of India में केरल के Sabarimala Temple सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म की मूल संरचना को कमजोर नहीं किया जा सकता।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna ने कहा कि भारत की सभ्यता और धार्मिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 भी देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं, इसलिए वर्तमान की व्याख्या करते समय अतीत को पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।
वरिष्ठ अधिवक्ता Indira Jaising ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट का पूर्व फैसला अभी भी प्रभावी है और उस पर कोई रोक नहीं लगी है। इसके बावजूद महिलाओं को प्रवेश नहीं मिल पा रहा है, जिसका कारण राज्य सरकार की ओर से पर्याप्त सहयोग न होना बताया गया। उन्होंने यह भी कहा कि अदालत धर्म की परिभाषा तय नहीं करती, बल्कि यह धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं का विषय है।
सुनवाई के दौरान यह भी अहम प्रश्न उठा कि संविधान की व्याख्या पूरी तरह आधुनिक दृष्टिकोण से की जाए या ऐतिहासिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच विस्तृत बहस हुई, जिससे मामले की संवेदनशीलता और जटिलता साफ झलकती है।
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