विकास के अमृत में भ्रष्टाचार का ज़हर: कागजों में विकास, जमीन पर करोड़ों का घोटाला
भोपाल (आरएनआई) मध्यप्रदेश में शहरी विकास के नाम पर लागू की गई केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी अमृत 2.0 योजना अब प्रदेश में विकास का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, संरक्षण, दबंगई, फर्जीवाड़े और हिंसा के गंभीर आरोपों का पर्याय बनती जा रही है। जिस योजना का उद्देश्य शहरों और कस्बों में स्वच्छ पेयजल, बेहतर सीवरेज व्यवस्था, तालाबों का संरक्षण, पार्कों का विकास और आधारभूत ढांचे को मजबूत करना था, वही योजना अब कागजों पर सौ प्रतिशत प्रगति और जमीन पर अधूरे, घटिया और अस्तित्वहीन कामों की कहानी बनकर सामने आ रही है। इस पूरे विवाद के केंद्र में प्रोजेक्ट एंड मैनेजमेंट कंसल्टेंट के रूप में नियुक्त टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स लिमिटेड की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि जिस संस्था को गुणवत्ता, पारदर्शिता और निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उसी संस्था के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों ने ठेकेदारों के साथ मिलकर अमृत 2.0 को भ्रष्टाचार का मॉडल बना दिया।

अमृत 2.0 के तहत मध्यप्रदेश के कई जिलों में वॉटर सप्लाई, सीवरेज, वॉटर बॉडी और पार्क निर्माण से जुड़े करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट स्वीकृत किए गए। लेकिन स्थानीय निकायों, नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि अधिकांश परियोजनाओं में वास्तविक रूप से केवल 20 से 30 प्रतिशत काम कराकर कागजों और अमृत पोर्टल पर 80 से 100 प्रतिशत कार्य पूर्ण दिखा दिया गया और पूरा भुगतान निकाल लिया गया। इस कथित घोटाले में टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स के टीम लीडर सुनील गंगाधरन और उनके अधीन कार्यरत रेसिडेंट इंजीनियर ऋषि पाठक की भूमिका लगातार विवादों में रही है। आरोप है कि इन अधिकारियों ने बिना साइट माप, बिना गुणवत्ता जांच, बिना डिजाइन और ड्राइंग के ठेकेदारों के बिल पास किए और शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
इसी माहौल के बीच अब अमृत 2.0 से जुड़े मामलों में केवल तकनीकी भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि अपराधियों को संरक्षण देने, शिकायतकर्ताओं को डराने और हिंसा के जरिए चुप कराने जैसे गंभीर आरोप भी सामने आने लगे हैं। भोपाल निवासी रंजीत सिंह उईके ने थाना हबीबगंज में दी गई अपनी लिखित शिकायत में बताया कि टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स से जुड़े विनायक रावत ने उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट की। यह घटना रानी कमलापति रेलवे स्टेशन के सामने स्थित करतार टावर की तीसरी मंजिल पर हुई। शिकायतकर्ता के अनुसार आरोपी ने न केवल अभद्र और जाति-सूचक गालियां दीं, बल्कि शारीरिक रूप से हमला भी किया और जान से मारने की धमकी दी।

रंजीत सिंह उईके का आरोप है कि विनायक रावत कोई सामान्य कर्मचारी नहीं है, बल्कि एक आदतन अपराधी है, जिसके खिलाफ भोपाल के विभिन्न थानों में पहले से ही भ्रष्टाचार, जाति-सूचक गाली-गलौज और अन्य आपराधिक मामलों में शिकायतें दर्ज हैं। पुलिस द्वारा उसे पूर्व में बाउंड ओवर भी किया गया था, इसके बावजूद वह खुलेआम दबंगई करता रहा। शिकायत में यह भी कहा गया है कि आरोपी अपने पास हथियार रखता है और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स में खुद को बड़ा अधिकारी बताकर कई लोगों से पैसों की ठगी कर चुका है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि ऐसे व्यक्ति को टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है। शिकायतकर्ता और अन्य सूत्रों का दावा है कि टीसीई के मैनेजर विनोद शुक्ला और टीम लीडर सुनील गंगाधरन द्वारा विनायक रावत जैसे लोगों को संरक्षण दिया गया ताकि अमृत 2.0 से जुड़े कार्यों में अवैध वसूली, दबाव और डर की रणनीति को लागू किया जा सके। आरोप है कि जिन लोगों ने भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए, शिकायतें कीं या उच्च अधिकारियों और जांच एजेंसियों तक मामले पहुंचाए, उन्हें डराने, धमकाने और चुप कराने का काम ऐसे तत्वों के जरिए कराया गया।

यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि जब तक भोपाल और आसपास के क्षेत्रों में रेसिडेंट इंजीनियर ऋषि पाठक ठेकेदारों के साथ तालमेल बनाकर काम कर रहे थे, तब तक पूरा तंत्र बिना किसी बाधा के चलता रहा। लेकिन जैसे ही शिकायतें ईओडब्ल्यू और नगरीय प्रशासन के उच्च अधिकारियों तक पहुंचने लगीं और कार्रवाई की आशंका बढ़ी, वैसे ही कुछ लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने की कोशिशें शुरू हुईं। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि अमृत 2.0 के नाम पर केवल तकनीकी लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा था।
राजधानी भोपाल से लगभग 52 किलोमीटर दूर राजगढ़ जिले के कुरावर नगर परिषद क्षेत्र में अमृत 2.0 के तहत लगभग 60 लाख रुपये की लागत से बनाया गया वॉटर बॉडी प्रोजेक्ट इस पूरे कथित भ्रष्टाचार का सबसे ठोस और प्रत्यक्ष उदाहरण माना जा रहा है। स्थानीय नागरिकों के अनुसार जिसे तालाब बताकर सौंदर्यीकरण कराया गया, वह वास्तव में पहले से मौजूद एक नाला था। गर्मी के मौसम में पानी सूखने के बाद स्थानीय लोगों द्वारा मुरम निकालने से यह नाला पहले ही 15 फीट से अधिक गहरा हो चुका था, लेकिन इसके बावजूद ठेकेदार ने टेंडर के अनुसार कोई वास्तविक गहरीकरण नहीं कराया।
टेंडर शर्तों के अनुसार इस प्रोजेक्ट में जीआई फेसिंग और स्टोन पिचिंग कुल 430 मीटर होनी थी, लेकिन जमीन पर केवल लगभग 130 मीटर ही फेसिंग और पिचिंग की गई। पिचिंग में जहां कम से कम 40 किलोग्राम वजन के पत्थरों का उपयोग अनिवार्य था, वहां मौके पर 5 किलोग्राम से भी कम वजन के पत्थर लगाए गए। पत्थरों के नीचे डाली जाने वाली फिल्टर मीडिया यानी गिट्टी की परत नहीं डाली गई और पत्थर सीधे मिट्टी में रख दिए गए। वीविंग की गहराई टेंडर में 8 मीटर निर्धारित थी, लेकिन वास्तविकता में केवल 4 मीटर ही बनाई गई। पूरे तालाब के चारों ओर बंड बनना था, लेकिन उसे भी अधूरा छोड़ दिया गया।
इसके बावजूद अमृत पोर्टल पर इस प्रोजेक्ट को 80 से 100 प्रतिशत पूर्ण दिखाकर पूरा भुगतान करा लिया गया। आरोप है कि इस फर्जीवाड़े में गूगल टैगिंग और फोटो मॉनिटरिंग सिस्टम का भी दुरुपयोग किया गया। कुरावर प्रोजेक्ट की निगरानी कर रहे रेसिडेंट इंजीनियर ऋषि पाठक पर आरोप है कि उन्होंने इंटरनेट से डाउनलोड की गई तस्वीरें अमृत पोर्टल पर अपलोड कर दीं। पोर्टल पर अपलोड की गई जीआई फेसिंग की तस्वीरों में लोहे के पिलर दिखाई देते हैं, जबकि वास्तविक साइट पर सीमेंट के पिलर लगाए गए हैं। गहरीकरण के नाम पर जेसीबी मशीन से खुदाई करते हुए तस्वीरें अपलोड की गईं, जबकि स्थानीय नागरिकों का दावा है कि वहां कभी जेसीबी मशीन लगी ही नहीं और कोई नई खुदाई नहीं हुई।
कुरावर ही नहीं, राजगढ़ जिले के ब्यावरा, राजगढ़, नरसिंहगढ़, खुजनेर, पचौर, सुथालिया और जीरापुर जैसे अन्य नगर परिषद क्षेत्रों में भी अमृत 2.0 के तहत कराए गए कार्यों में इसी तरह की अनियमितताएं सामने आई हैं। ब्यावरा वॉटर बॉडी के मामले में अमृत पोर्टल पर 50 प्रतिशत काम पूरा दिखाया गया है, जबकि जमीन पर 30 प्रतिशत से भी कम काम हुआ है। वहां फेंसिंग के लिए लगाए गए अधिकतर पिलर बिना कंक्रीट के गाड़ दिए गए, जो कुछ ही महीनों में गिर गए। स्टोन पिचिंग में 200 एमएम के पत्थरों के बजाय उससे आधे साइज के पत्थर इस्तेमाल किए गए और फिल्टर मीडिया भी नहीं डाली गई, जिससे पत्थर मिट्टी में धंसते जा रहे हैं।
पचौर वॉटर बॉडी प्रोजेक्ट की कुल लागत लगभग 81 लाख 98 हजार रुपये बताई गई है। टेंडर के अनुसार इस प्रोजेक्ट में 7,534 क्यूबिक मीटर खुदाई कार्य के लिए लगभग 20 लाख रुपये का प्रावधान था, लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार कोई खुदाई नहीं की गई। स्टोन पिचिंग के लिए 550 मीटर लंबाई और लगभग 28 लाख रुपये का बजट था, लेकिन एक मीटर भी पिचिंग नहीं की गई। जीआई फेसिंग के लिए 1,480 मीटर और लगभग 18 लाख रुपये का प्रावधान था, लेकिन फेसिंग नहीं की गई। प्लांटेशन के लिए 125 पौधों और लगभग 1.74 लाख रुपये का प्रावधान था, लेकिन एक भी पौधा नहीं लगाया गया। इसके बावजूद 80 प्रतिशत काम पूरा दिखाकर भुगतान कर लिया गया। स्टोन पिचिंग की जगह ठेकेदार ने तालाब का मलबा भर दिया, जो बारिश में बहकर फिर तालाब में चला गया।
राजगढ़ जिले के बोडा क्षेत्र में शिव मंदिर के पीछे वार्ड-9 बाल्मीकि मोहल्ला में पार्क निर्माण के नाम पर भी सरकारी धन की खुली लूट का आरोप है। लगभग 13 लाख 18 हजार रुपये का बजट जारी किया गया, लेकिन जमीन पर पार्क का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। केवल एक तरफ 50 से 60 मीटर की बाउंड्री और उतनी ही लंबाई का पाथवे बनाया गया। एंट्री गेट, बेंच, लाइट, किड्स प्ले इक्विपमेंट, प्लांटेशन, वॉटर सप्लाई और पिट जैसी किसी भी मद में वास्तविक काम नहीं हुआ। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वहां लगे ओपन जिम उपकरण सांसद निधि से लगाए गए थे, लेकिन नगर परिषद अधिकारियों ने उन्हें अमृत 2.0 का काम बताकर पेश किया।
भोपाल की अरेरा कॉलोनी में अमृत योजना के तहत सीवरेज लाइन डालने के बाद सड़क की मरम्मत और पुनर्स्थापन भी ठीक से नहीं किया गया। सड़क की खुदाई के बाद मलबा किनारे छोड़ दिया गया, गड्ढों को केवल पत्थर और गिट्टी से भर दिया गया और कंक्रीट से पैक नहीं किया गया। इससे रोजाना दुर्घटनाओं का खतरा बना हुआ है और धूल उड़ने से रहवासी परेशान हैं। इस कार्य की मॉनिटरिंग भी टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स की जिम्मेदारी थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
इन सभी मामलों को लेकर भोपाल निवासी अक्षय मालवीय ने आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ के महानिदेशक को विस्तृत शिकायत सौंपी है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि अमृत 2.0 योजना के तहत राजगढ़ और अन्य जिलों में हुए कार्यों में टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स के कर्मचारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से आधा-अधूरा और घटिया काम कर 100 प्रतिशत भुगतान पास कराया गया। ईओडब्ल्यू द्वारा शिकायत की जांच के बाद प्रकरण दर्ज कर आगे की कार्रवाई किए जाने की बात कही गई है और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स के कर्मचारियों को तलब किए जाने की संभावना जताई जा रही है।
नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के प्रमुख अभियंता प्रदीप एस मिश्रा ने भी टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स के टीम लीडर सुनील गंगाधरन को हटाने के लिए कंपनी को पत्र लिखा था। पत्र में स्पष्ट किया गया था कि योजनाओं की प्रभावी मॉनिटरिंग नहीं की जा रही है, बैठकों में संतोषजनक उत्तर नहीं दिए जा रहे हैं और कार्यों में निष्क्रियता तथा गुणवत्ता की गंभीर कमी पाई गई है। इसके बावजूद कंपनी द्वारा अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
ऋषि पाठक के खिलाफ भी सिराली, टिमरनी, भैरूदा, सीहोर, जावर, खिलचीपुर, खुजनेर, कुरावर, राजगढ़, पचौर और नरसिंहगढ़ सहित कई नगर परिषदों और नगरपालिकाओं से शिकायतें दर्ज कराई जा चुकी हैं। उन पर बिना साइट माप के मनमाने ढंग से बिल पास कराने, डिजाइन और ड्राइंग के बिना भुगतान कराने और ठेकेदारों से प्रतिशत तय कर भ्रष्टाचार करने के आरोप हैं। कई शिकायतें ईओडब्ल्यू में भी की जा चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई है।
इन सबके साथ-साथ अमृत 2.0 के तहत प्रदेश में चल रहे बड़े वॉटर सप्लाई और सीवरेज प्रोजेक्ट्स के आंकड़े भी सामने आए हैं, जिनमें बार-बार टेंडर रद्द होना, सिंगल बिडर पर काम आवंटित होना और दरों का अत्यधिक बढ़ जाना दर्ज है। ग्वालियर, भोपाल, जबलपुर, रीवा, देवास, बड़वानी, बुरहानपुर, सांवेर, छतरपुर, छापीहेड़ा, शाहगंज और जबलपुर कैंट जैसे शहरों में करोड़ों रुपये की परियोजनाओं में रिटेंडरिंग और सिंगल बिडर के जरिए कार्य स्वीकृत किए जाने से पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा पर सवाल खड़े हो गए हैं।
इन तमाम तथ्यों, आरोपों, शिकायतों और घटनाओं के बीच अब मारपीट, धमकी और संरक्षण के आरोप सामने आने से अमृत 2.0 से जुड़ा पूरा तंत्र कठघरे में खड़ा हो गया है। जनता के बीच यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि जब अमृत 2.0 जैसी योजना से शहरों में स्वच्छ पानी, बेहतर सीवरेज और गुणवत्तापूर्ण जीवन का वादा किया गया था, तो आखिर किसने इस अमृत में भ्रष्टाचार, दबंगई और हिंसा का जहर घोल दिया और जिम्मेदारों पर कार्रवाई आखिर कब होगी।
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