तंदूर बनती यात्री बसें: आखिर कब जागेगा परिवहन विभाग?
मध्य प्रदेश में यात्री बसें अब सफर का साधन कम और चलते-फिरते खतरे ज्यादा बनती जा रही हैं। आए दिन बसों में आग लगने की घटनाएं यात्रियों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। दो दिन पहले मक्सी में इंटरसिटी Volvo बस में अचानक आग लगने से 4 वर्षीय मासूम अनय की दर्दनाक मौत हो गई थी। इसके बाद अब इंदौर से सागर जा रही Chartered बस में विदिशा जिले के ग्यारसपुर के पास भीषण आग लग गई। गनीमत रही कि इस हादसे में अधिकांश यात्री समय रहते बाहर निकल गए।
दोनों घटनाओं में एक समानता साफ दिखाई दी — बसों के AC सिस्टम में तकनीकी खराबी। शुरुआती जानकारी के अनुसार AC में फॉल्ट आने के कारण आग भड़की और देखते ही देखते पूरी बस आग का गोला बन गई। सवाल यह है कि आखिर सड़कों पर दौड़ रही इन लग्जरी बसों की फिटनेस जांच कितनी गंभीरता से की जाती है?
यात्रियों से मोटा किराया वसूलने वाले कई बस संचालक सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर बसों का संचालन कर रहे हैं। कई बसों में Emergency Exit के सामने अतिरिक्त सीटें लगाकर बाहर निकलने का रास्ता तक बंद कर दिया जाता है। हादसे के वक्त यही लापरवाही यात्रियों की जान पर भारी पड़ सकती है।
लेकिन जिम्मेदारी केवल बस मालिकों की नहीं है। परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। आरोप है कि विभाग सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंदे बैठा रहता है और फिटनेस सर्टिफिकेट जारी कर देता है। हादसा होने के बाद केवल खानापूर्ति के लिए सीमित कार्रवाई कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
लगातार हो रहे इन हादसों ने यह साफ कर दिया है कि यदि समय रहते बसों की तकनीकी जांच, सुरक्षा उपकरणों की अनिवार्य व्यवस्था और परिवहन विभाग की जवाबदेही तय नहीं की गई, तो यात्रियों की जान यूं ही खतरे में पड़ती रहेगी।
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