कानून की छाती पर तांडव: पुलिस की मौजूदगी में तलवारों और बंदूकों का खूनी खेल, या महज़ एक तमाशा!
सिद्धार्थनगर। कानून का राज, सुशासन और ‘जीरो टॉलरेंस’ के बड़े-बड़े दावे करने वाले हुक्मरानों के कानों पर शायद अब जूं भी नहीं रेंगती। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले से विजयदशमी के मौके पर जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, वे किसी भी सभ्य समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा हैं। चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल की मौजूदगी और प्रशासनिक मुस्तैदी के दावों के बीच, खुलेआम सड़कों पर तलवारें और घातक असलहे लहराए गए। क्या इसी ‘रामराज्य’ का सपना दिखाया गया था, जहां कानून के रखवाले तमाशबीन बनकर खड़े रहें और भीड़ तंत्र खुलेआम हथियारों की नुमाइश करे।
वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे शस्त्र पूजन जुलूस के नाम पर कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। डबल बैरल बंदूकों की नुमाइश और चमकती हुई तलवारें हवा में लहराते हुए यह भीड़ क्या संदेश देना चाहती है? क्या यह किसी त्यौहार का जश्न है या फिर खुलेआम कानून को चुनौती देने का दुसाहस? जिस राज्य में जरा-जरा सी बात पर बुलडोजर कार्रवाई और एनकाउंटर के ढोल पीटे जाते हैं, उसी राज्य में पुलिस की छांव में इस तरह का तांडव प्रशासन की नीयत और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सवाल यह उठता है कि क्या देश में कानून सिर्फ आम नागरिकों और कमजोरों के लिए रह गया है! यदि यही नंगा नाच किसी अन्य पक्ष या आम आदमी ने किया होता, तो अब तक घरों पर बुलडोजर चल चुके होते और एनएसए (NSA) जैसी गंभीर धाराएं लग चुकी होतीं। लेकिन जब सत्ता के चहेते या एक खास विचारधारा के लोग कानून की धज्जियां उड़ाते हैं, तो प्रशासन की आंखें क्यों मूंद ली जाती हैं! क्या ‘समान अधिकार’ का संविधानिक हक़ सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए है।
यह घटना सिर्फ एक जिले की नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जो देश को अराजकता की आग में झोंक रही है। हुक्मरानों को यह समझना होगा कि कुर्सी की चमक और राजनीतिक चश्मे से जब अपराध देखना शुरू किया जाता है, तो अंततः व्यवस्था खुद ही ढह जाती है। अगर सिद्धार्थनगर की इस शर्मनाक घटना पर तुरंत सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मान लिया जाएगा कि सरकार और प्रशासन ने असंवैधानिक ताकतों के आगे घुटने टेक दिए हैं।
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