खोजी पत्रकारिता क्यों सिमटती जा रही है? फिल्म ‘रिपोर्टिंग लाइव’ के जरिए समझिए पत्रकारों की चुनौतियां
कुछ माह पहले मुझसे किसी ने पूछा था कि आज खोजी पत्रकारिता लगभग विलुप्त क्यों होती जा रही है? सच कहूं तो पत्रकारिता में कदम रखने के साथ ही मैंने भी यह सवाल महसूस किया था। अपराधों को उजागर करने के लिए पुलिस के पास कानूनी अधिकार होते हैं। सेना, नेताओं और प्रशासन के पास भी अपने-अपने अधिकार और व्यवस्थाएं हैं, लेकिन पत्रकार के पास खबर सामने लाने की जिम्मेदारी तो होती है, पर उसकी सुरक्षा और संरक्षण को लेकर कई सवाल बने रहते हैं।
पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि जुनून और जिम्मेदारी भी है। खोजी पत्रकारिता में कई बार उन सच्चाइयों को सामने लाना पड़ता है, जिन्हें उजागर होने से रोकने की कोशिश की जाती है। यह काम जोखिम भरा हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब किसी खबर की पड़ताल करते हुए पत्रकार और उसके परिवार की सुरक्षा खतरे में पड़ जाए, तो वह किस भरोसे पर आगे बढ़े?
जासूसों की तरह पत्रकार भी कई बार गुमनाम रहकर काम करते हैं। फर्क इतना है कि पत्रकार का काम समाज के सामने तथ्यों को रखना और सत्ता, व्यवस्था तथा अपराध से जुड़े सवालों की पड़ताल करना है। लेकिन जब किसी पत्रकार को अपने काम के कारण धमकियों या हमलों का सामना करना पड़ता है, तो उसके सामने पेशेवर जिम्मेदारी के साथ अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता भी खड़ी हो जाती है।
कुछ दिन पहले धनबाद में कोयला माफिया से जुड़ी खबरों की पड़ताल करने वाले एक पत्रकार पर हमले की घटना ने एक बार फिर इस सवाल को सामने ला दिया कि जोखिम उठाने वाले पत्रकारों को कितना संरक्षण मिलता है। छत्तीसगढ़, बिहार और महाराष्ट्र सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में पत्रकारों पर हमलों की खबरें आती रही हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी पत्रकारों को रिपोर्टिंग के दौरान गंभीर जोखिमों का सामना करना पड़ा है। इनमें से कितने पत्रकारों के नाम आम लोगों को याद रहते हैं और कितनी बार उनके संघर्ष पर चर्चा होती है?
हम अक्सर कह देते हैं कि पत्रकारिता दलाली का धंधा बन गई है, लेकिन क्या हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि एक पत्रकार किन परिस्थितियों में काम करता है? उसकी आर्थिक मजबूरियां क्या हैं? उसकी सुरक्षा के लिए कौन-से कानूनी प्रावधान हैं? और जब वह किसी प्रभावशाली व्यक्ति या आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ खबर करता है, तो उसे किस तरह के दबावों का सामना करना पड़ सकता है?
पुलिसकर्मी या सैनिक ड्यूटी के दौरान शहीद होते हैं, तो उनके सम्मान और परिवार की सहायता के लिए विभिन्न सरकारी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। वहीं, पत्रकारों की सुरक्षा, उनके परिजनों को सहायता और जोखिम भरे काम के दौरान मिलने वाले संरक्षण को लेकर भी गंभीर चर्चा की जरूरत है। अपराध उजागर करते समय किसी पत्रकार की जान चली जाए, तो उसके परिवार के सामने आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां भी खड़ी हो सकती हैं।
मुंबई के वसई में एक खोजी पत्रकार के साथ हुई भयावह घटना का उल्लेख भी इस संदर्भ में किया जाता है। ऐसी घटनाएं पत्रकारिता के जोखिम और पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े सवालों को और गंभीर बना देती हैं। किसी भी पत्रकार पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि सूचना सामने लाने और सवाल पूछने के अधिकार के लिए भी चिंता का विषय है।
पत्रकारिता की मजबूरियां क्या हैं? खोजी पत्रकारों को किस तरह के दबावों और साजिशों का सामना करना पड़ सकता है? आर्थिक असुरक्षा और जान का खतरा पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कैसे प्रभावित करते हैं? और आखिर क्यों कई बार पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य से दूर होकर केवल व्यवसाय तक सिमटती दिखाई देती है?
इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म ‘रिपोर्टिंग लाइव’ देखने की अपील की जा सकती है। फिल्म ने खोजी पत्रकारिता को लेकर मेरे मन में उठने वाले कई सवालों पर सोचने के लिए मजबूर किया। संभव है कि इसे देखने के बाद दूसरे लोग भी पत्रकारों के काम, उनकी चुनौतियों और उनकी सुरक्षा को एक नए नजरिए से समझ सकें।
पत्रकारिता से असहमति हो सकती है, किसी खबर पर सवाल उठाए जा सकते हैं और पत्रकार की आलोचना भी की जा सकती है। लेकिन किसी खबर की निष्पक्षता पर सवाल उठाने और सच सामने लाने वाले पत्रकार की सुरक्षा को नजरअंदाज करने में फर्क है। लोकतंत्र में स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता की भूमिका को समझना तथा पत्रकारों के अधिकारों और सुरक्षा पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।
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