सुप्रीम कोर्ट सख्त, जल निकायों की पहचान और सीमांकन चार महीने में पूरा करने का आदेश
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में जल निकायों और आर्द्रभूमियों के संरक्षण को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि जब बहुमूल्य जल निकाय असुरक्षित हों, तो वह मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकती। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने सभी राज्यों और संबंधित प्राधिकरणों को जल निकायों की जमीनी स्तर पर जांच और सीमांकन का काम निर्धारित समय में पूरा करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि जल निकाय पेयजल के महत्वपूर्ण स्रोत हैं और उनका संरक्षण संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जुड़ा है। पीठ ने इस बात पर चिंता जताई कि वर्ष 2017 में आर्द्रभूमि संरक्षण से संबंधित नियम अधिसूचित होने के लगभग नौ साल बाद भी जमीनी सत्यापन और सीमांकन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरणों को चार महीने के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। साथ ही, संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल कर उठाए गए कदमों और अपनाई गई प्रक्रिया की जानकारी देने को कहा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह काम केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि मौके पर जाकर जल निकायों की वास्तविक स्थिति और सीमाओं की पुष्टि करनी होगी।
यह मामला जल निकायों के संरक्षण से संबंधित जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। अदालत ने दोहराया कि जल संसाधनों की सुरक्षा और उनके अतिक्रमण व क्षरण को रोकना जरूरी है, ताकि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
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