एमपी में भ्रष्टाचार के मामलों पर बड़ा सवाल: लोकायुक्त के 1063 केस में सिर्फ 7 में सजा, कार्रवाई की रफ्तार पर उठे सवाल
भोपाल। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के मामलों में लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) की कार्रवाई के बावजूद मामलों के निपटारे और सजा की दर को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2022-23 से अब तक लोकायुक्त में 1,063 आपराधिक मामले दर्ज किए गए, लेकिन इनमें केवल 7 मामलों में सजा होने की बात सामने आई है। 393 मामलों की जांच पूरी होने के बावजूद कई प्रकरणों में अभियोजन की प्रक्रिया लंबित बताई गई है।
इसी बीच लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू की अलग-अलग कार्रवाइयों में अधिकारियों और कर्मचारियों पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने तथा पद के कथित दुरुपयोग के आरोप सामने आए हैं। हालांकि, इन मामलों में लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी।
एक मामले में मध्य प्रदेश पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के अधीक्षण यंत्री शिवराम सोमिल के खिलाफ लोकायुक्त कार्रवाई का उल्लेख है। रिपोर्ट के अनुसार, 21 जुलाई को इंदौर, पीथमपुर और धार समेत 9 ठिकानों पर छापेमारी की गई। लोकायुक्त के मुताबिक, करीब 33 वर्ष की सेवा में उनकी अनुमानित वैध आय लगभग 2 करोड़ रुपये होनी चाहिए थी, जबकि जांच में करीब 17 करोड़ रुपये की संपत्ति मिलने का दावा किया गया। इसे वैध आय से करीब 258 प्रतिशत अधिक बताया गया। छापे के दौरान सोना, चांदी और नकदी के अलावा विभिन्न संपत्तियां मिलने की जानकारी भी सामने आई।
दूसरे मामले में एमवाय अस्पताल के फार्मासिस्ट राकेश गोरेखे के खिलाफ दवा खरीद में कथित अनियमितताओं की जांच का उल्लेख है। आरोप है कि स्थानीय फर्मों के साथ मिलीभगत कर कागजों पर दवाओं की आपूर्ति दिखाकर बिल तैयार किए गए। 5 अगस्त को ईओडब्ल्यू की कार्रवाई के दौरान उनकी संपत्ति की जांच की गई। रिपोर्ट के अनुसार, दंपती की कुल वैध आय करीब 1.11 करोड़ रुपये आंकी गई, जबकि 2.13 करोड़ रुपये से अधिक की चल-अचल संपत्ति मिलने का दावा किया गया।
एक अन्य मामले में कंडवाल से जुड़ी जांच में करीब 9.5 करोड़ रुपये की संपत्ति सामने आने की बात कही गई है। जांच में पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के पास 12 प्लॉट और इंदौर में एक व्यावसायिक प्लॉट सहित कई संपत्तियों का उल्लेख है। प्रारंभिक जांच में संपत्ति वैध आय से करीब 241 प्रतिशत अधिक होने का दावा किया गया है। इसके अलावा कुपोषण और आंगनवाड़ी रखरखाव के बजट से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं की भी जांच की गई।
पांडेय के मामले में करीब 4.59 करोड़ रुपये की अनुपातहीन संपत्ति मिलने का दावा किया गया है। जांच के अनुसार, उनकी वैध आय करीब 80 लाख रुपये थी, जबकि संपत्ति इससे 474.84 प्रतिशत अधिक बताई गई। कार्रवाई के बाद निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल द्वारा निलंबन किए जाने का भी उल्लेख है। जांच में पत्नी के नाम पर इमारतों और हॉस्टल से जुड़ी संपत्तियों की जानकारी सामने आने की बात कही गई है।
वहीं, विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक 2022-23 से अब तक लोकायुक्त को 1,884 शिकायतें मिलीं और 1,063 आपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें केवल 7 मामलों में सजा हुई। दूसरी ओर, वर्ष 2020 से जनवरी 2026 तक ईओडब्ल्यू को 19,775 शिकायतें मिलने की जानकारी दी गई है। जनवरी 2026 में प्राप्त 437 शिकायतों में से 566 मामलों में एफआईआर दर्ज होने का आंकड़ा भी रिपोर्ट में दिया गया है, हालांकि प्रस्तुत आंकड़ों में संख्यात्मक असंगति दिखाई देती है, इसलिए इसकी आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।
रिटायर्ड आईएएस अधिकारी डॉ. मोहन गुप्ता ने भ्रष्टाचार के मामलों में जांच के साथ समयबद्ध अभियोजन और जल्द सजा की जरूरत पर जोर दिया है। उनका कहना है कि यदि मामलों में कार्रवाई लंबे समय तक चलती रहे तो कानून का भय कमजोर पड़ सकता है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि भ्रष्टाचार की शिकायत से लेकर एफआईआर, जांच, अभियोजन और सजा तक की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों हो रही है। निगरानी एजेंसियों की कार्रवाई तभी प्रभावी मानी जाएगी, जब निष्पक्ष जांच के साथ दोष सिद्ध होने पर समयबद्ध तरीके से कानूनी कार्रवाई भी सुनिश्चित हो।
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