हिमाचल की ग्लेशियर झीलें बनीं ‘टाइम बम’, 88 बेहद संवेदनशील; अध्ययन में बड़ा खुलासा
जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। ऊंचाई वाले संवेदनशील इलाकों में बर्फबारी की जगह बारिश और रेन-ऑन-स्नो जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे ग्लेशियर झीलों में पानी की मात्रा बढ़ने के साथ उनके प्राकृतिक बांधों पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में भारी बारिश, बादल फटना, भूस्खलन, हिमस्खलन और भूकंपीय गतिविधियों के दौरान ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड का खतरा गंभीर होता जा रहा है।
आईआईटी रोपड़ और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी के संयुक्त अध्ययन में हिमाचल प्रदेश की 0.02 वर्ग किलोमीटर या उससे अधिक क्षेत्र वाली 94 ग्लेशियर झीलों का आकलन किया गया। अध्ययन में इनमें से 88 झीलों को बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील पाया गया है। यह रिसर्च 1990 से 2024 तक के 34 वर्षों के उपग्रह और जलवायु संबंधी आंकड़ों पर आधारित है और इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हाइड्रोलॉजी रीजनल स्टडीज में प्रकाशित हुई है।
अध्ययन के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर झीलों की संख्या 1990 में 107 थी, जो 2024 में बढ़कर 669 हो गई। यानी 34 वर्षों में झीलों की संख्या में करीब 525 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी अवधि में इन झीलों का कुल क्षेत्रफल 5.54 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 11.20 वर्ग किलोमीटर हो गया।
सबसे ज्यादा चिंता छोटी ग्लेशियर झीलों को लेकर है। 0.01 वर्ग किलोमीटर से कम क्षेत्रफल वाली झीलों की संख्या 1990 में केवल नौ थी, जो 2024 में बढ़कर 487 हो गई। वहीं, अध्ययन में 94 प्रमुख झीलों में से 73 के मोरेन बांधों को संरचनात्मक रूप से अस्थिर पाया गया है।
भूकंपीय गतिविधि और रॉकफॉल का भी खतरा
रिपोर्ट के अनुसार 58 ग्लेशियर झीलें सक्रिय भूकंपीय गतिविधियों और टेक्टोनिक फॉल्ट वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। 52 झीलों में बर्फ की आंतरिक परत पिघलने के कारण रिसाव और प्राकृतिक बांध टूटने का खतरा बताया गया है। इसके अलावा 44 झीलों के आसपास की ढलानों पर रॉकफॉल का जोखिम दर्ज किया गया है।
जोखिम के आधार पर नौ झीलों को अति उच्च, 18 को उच्च और 26 को मध्यम जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक भारी बारिश, बादल फटने, भूस्खलन या हिमस्खलन के कारण अचानक बड़ी मात्रा में पानी झील में पहुंचने पर प्राकृतिक बांध टूट सकता है।
ऐसी स्थिति में झील से अचानक निकलने वाला पानी नीचे की ओर बसे इलाकों में तबाही मचा सकता है। इससे सड़क, पुल, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचने का खतरा है। अध्ययन ने हिमाचल की ग्लेशियर झीलों की लगातार निगरानी और संवेदनशील क्षेत्रों के लिए समय रहते चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत को रेखांकित किया है।
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