हिड़मा ने दिया था राजा राठौर को मारने का प्रस्ताव, बस्तर में पत्रकारिता के खतरनाक दौर की पूरी कहानी
सुकमा (बस्तर)। बस्तर में पत्रकारिता करना कभी कुएँ और खाई के बीच संतुलन बनाकर चलने जैसा था। यहां जरा-सी चूक जान पर भारी पड़ सकती थी। सुकमा और बीजापुर में पत्रकार नेमीचंद जैन और साईं रेड्डी की नक्सलियों के हाथों हत्या के बाद इलाके में पत्रकारिता करना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया था। ऐसे माहौल में राजा सिंह राठौर ने सुकमा जिले के दोरनापाल से अपनी पत्रकारिता शुरू की। उस समय उनकी उम्र महज 19-20 वर्ष थी और चारों ओर नक्सली हिंसा का खौफ फैला हुआ था।
राजा राठौर के मुताबिक, दोरनापाल का निवासी होने के कारण नक्सलियों को उन पर सलवा जुडूम अभियान से जुड़े होने का संदेह भी रहता था। हालांकि, कम उम्र होने के कारण शुरुआत में उन्हें बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया। वर्ष 2011 में पहली बार कांकेरलंका के सरपंच मुचाकी लिंगा की रिहाई को लेकर आयोजित जनअदालत में उन्हें बुलाया गया। लिंगा के बेटे गंगा उनके सहपाठी थे। गंगा जब उन्हें बुलावे की जानकारी देने पहुंचे, तो राठौर को आशंका हुई कि कहीं यह उन्हें अपने कब्जे में लेने की कोई रणनीति तो नहीं है। दो दिन तक विचार करने के बाद उन्होंने एक अन्य पत्रकार को इसकी जानकारी दी। वह पत्रकार रातोंरात दोरनापाल पहुंचे और जनअदालत की कवरेज कर लौट आए। इसके बाद नक्सलियों ने मुचाकी लिंगा को रिहा कर दिया।
इस घटना के करीब एक सप्ताह बाद नक्सलियों ने गंगा के माध्यम से राठौर को दोबारा बुलाया। इस बार उन्होंने जाने का फैसला किया और गंगा की बाइक से कोलाईगुड़ा गांव पहुंचे। वहां बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्रित थे। राठौर को एक छोटे से घर में खाट पर बैठाया गया, जहां वर्दी पहने एक नक्सली मौजूद था। उसके तेज आवाज में बैठने के लिए कहने पर वह घबरा गए। बाद में वह सभा में पहुंचे, जहां नक्सलियों की मिलिशिया का एक सदस्य पर्चा लेकर नारे लगा रहा था और ग्रामीण उसका जवाब दे रहे थे। राठौर के मन में उस समय लगातार यह आशंका बनी हुई थी कि कहीं सलवा जुडूम के खिलाफ लगाए जा रहे नारों का संबंध उनसे तो नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने अपने चेहरे पर डर जाहिर किए बिना कवरेज जारी रखी।
कवरेज के बाद उनकी मुलाकात नक्सली कमांडर वेट्टी रामा से हुई। रामा ने गंगा के माध्यम से संदेश दिया कि राजा राठौर को ठीक से काम करना है और इधर-उधर नहीं करना है। साथ ही कहा कि उन्हें आगे भी कवरेज के लिए बुलाया जाता रहेगा। राठौर ने संदेश स्वीकार किया और रात करीब आठ बजे घर लौटे। उनकी मां पूरे दिन उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। घर पहुंचने पर मां ने उनसे विस्तार से पूछा कि कहां गए थे, किससे मिले और क्या बातचीत हुई। जब राठौर ने बताया कि नक्सली उन्हें आगे भी बुलाते रहेंगे, तो मां ने भगवान का नाम लिया। उन्होंने बेटे की सुरक्षित वापसी के लिए मंदिर में दो नारियल चढ़ाने की मन्नत मांगी थी।
वर्ष 2012-13 के दौरान राठौर को फिर एक बुलावा मिला। इस बार उनसे पिछले दस दिनों के अखबार लेकर आने को कहा गया। वह घर में रखे नवभारत अखबार के बंडल से पिछले दस दिनों के अखबार लेकर एक व्यक्ति के साथ निकल पड़े। उन्हें रास्ते में भी पता नहीं था कि कहां जाना है। वह पालामड़गु गांव पहुंचे, जहां दो खाटों पर नई चटाई और कंबल बिछे हुए थे। कुछ देर बाद काली वर्दी और एके-47 राइफल के साथ कम हाइट का एक नक्सली वहां आया। उसने अपना नाम अर्जुन बताया और कहा कि वह कोंटा एरिया कमेटी का सचिव है।
राठौर के अनुसार, अर्जुन ने उनसे उनके बारे में बातचीत की और करीब आधे घंटे बाद कहा कि वह आगे भी वहां आते रहें। राठौर ने उसे अखबारों का बंडल सौंप दिया। वहां एक महिला नक्सली को वर्दी में खाना बनाते हुए देखकर उन्हें अहसास हुआ कि आसपास नक्सलियों की पूरी टीम मौजूद है। अर्जुन से बातचीत के बाद उन्हें लगा कि अब वह कुछ हद तक सुरक्षित रहकर पत्रकारिता कर सकेंगे। उनके मुताबिक, अर्जुन ने उन्हें अपनी बात लिखने के साथ-साथ अन्य पक्षों को भी अपने हिसाब से कवर करने की छूट दी, लेकिन संगठन से जुड़ी बातें किसी को न बताने को कहा। धीरे-धीरे दोनों के बीच संबंध सहज हो गए और अर्जुन उन्हें रिपोर्टिंग के लिए बुलाता रहा।

इसी दौरान वर्ष 2014-15 में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने राठौर की जिंदगी को खतरे में डाल दिया था। उनके संस्मरण के अनुसार, नक्सली कमांडर हिड़मा का एक पत्र अर्जुन के पास पहुंचा। पत्र में लिखा था कि राजा राठौर के पिता प्रमोद राठौर इंजरम से भेज्जी तक सड़क निर्माण का काम कर रहे हैं और राजा राठौर को मारने से यह काम बंद हो जाएगा। पत्र पढ़कर अर्जुन भी हैरान रह गया। उसने हिड़मा को जवाब भेजकर मामले की जांच करने के लिए समय मांगा।
राठौर के अनुसार, अर्जुन ने अपने स्तर पर जानकारी जुटाई और पता लगाया कि राजा राठौर दोरनापाल के रहने वाले हैं, जबकि प्रमोद राठौर सुकमा के निवासी हैं। दोनों के बीच कोई संबंध नहीं है और केवल उपनाम समान है। इसके बाद अर्जुन ने हिड़मा को जांच के निष्कर्ष से अवगत कराया। राठौर के मुताबिक, हिड़मा ने गलतफहमी दूर होने के बाद हत्या के प्रस्ताव पर आगे कार्रवाई नहीं की। उन्हें इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी कई वर्षों तक नहीं थी। वर्ष 2018 में अर्जुन के आत्मसमर्पण के बाद उसने उन्हें इस कथित हत्या प्रस्ताव के बारे में बताया। राठौर के अनुसार, अर्जुन वर्तमान में सुकमा पुलिस में आरक्षक के पद पर पदस्थ है।
इसके बाद 8 मार्च 2015 को अर्जुन ने राठौर को पोटकपल्ली में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित नक्सलियों के एक बड़े कार्यक्रम की कवरेज के लिए बुलाया। वहां उनकी मुलाकात स्वर्णा नाम की एक महिला नक्सली से हुई, जिसके पास कार्यक्रम की रूपरेखा लिखी फाइल थी। राठौर ने बताया कि फाइल में अंग्रेजी में लिखे शब्द देखकर वह हैरान रह गए। स्वर्णा ने उन्हें पेड़ के नीचे जाने के लिए कहा, जहां अर्जुन की टीम पहुंचने वाली थी। कुछ समय बाद हथियार और सामान लेकर नक्सलियों की एक लंबी कतार वहां पहुंची। राठौर ने अर्जुन और अन्य कमांडरों से मुलाकात की, कार्यक्रम की कवरेज की और फिर घर लौट आए।
वर्ष 2017 में उन्हें दुल्लेड़ गांव में कवरेज के लिए बुलाया गया। दोरनापाल से पोलमपल्ली और अतुलपारा होते हुए जंगल के रास्ते कई घंटे चलने के बाद वह वहां पहुंचे। गांव के बीच ग्रामीण एकत्रित थे और एक नक्सली कमांडर बच्चों के साथ खेल रहा था। उस समय नक्सलियों ने मुठभेड़ में मारे गए दो सदस्यों को ग्रामीण बताते हुए सभा आयोजित की थी। राठौर ने कार्यक्रम की कवरेज की और एक नक्सली की पीछे से तस्वीर भी ली।
वापसी के दौरान रात करीब आठ बजे वह पालामड़गु पहुंचे। वहां एक ग्रामीण ने उन्हें रोक लिया और उनके साथ आए नक्सली को एक घर के भीतर ले गया। कुछ देर बाद वह लौटा और बताया कि कोंटा एरिया कमेटी के डीसी सोड़ी केशा उनसे मिलना चाहते हैं। राठौर ने केशा से मुलाकात की। उसने उनसे पूछा कि वह कहां गए थे। राठौर ने जवाब दिया कि उन्हें उनके ही संगठन ने दुल्लेड़ में कवरेज के लिए बुलाया था। इस पर केशा ने कहा कि उसके इलाके से गुजरते समय बिना बताए आगे नहीं बढ़ना चाहिए। राठौर ने जवाब दिया कि जब संगठन के लोग ही उन्हें लेकर जाते हैं, तो उन्हें सूचना देने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए। केशा ने उन्हें रात में वहीं रुकने को कहा, लेकिन मां के इंतजार का हवाला देकर राठौर घर लौट आए।
अगले दिन दुल्लेड़ की घटना को लेकर खबर सामने आई कि ग्रामीणों ने पुलिस पर लोगों को मारकर नक्सली बताने का आरोप लगाया है। राठौर के अनुसार, उस समय के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने उनसे एक स्थानीय नेता के माध्यम से संपर्क किया। फोन पर बातचीत के दौरान अधिकारी ने उनसे कहा कि नक्सलियों से उनकी नजदीकी बढ़ रही है और उन्हें सावधान रहना चाहिए। राठौर ने जवाब दिया कि उन्हें कवरेज के लिए बुलाया जाता है और वह घटनाओं की रिपोर्टिंग करते हैं। अधिकारी ने उन्हें समझाया और बातचीत समाप्त हो गई।
राठौर के मुताबिक, वर्ष 2017 में ही एक और घटना हुई, जब कोंटा एरिया कमेटी के एक मिलिशिया कमांडर ने उनके नाम का पत्र दो सदस्यों के हाथों उनके घर भेजा। दोनों सदस्य दोपहर करीब ढाई बजे उनके पुराने खपरैल वाले घर पहुंचे। उस समय उनकी मां आराम कर रही थीं। दोनों ने उनके सिर के पास पत्र रखा, उन्हें उठाया और कहा कि राजा राठौर को तुरंत यह पत्र दे दिया जाए। इसके बाद वे वहां से चले गए। मां इस घटना से घबरा गईं और उन्होंने फोन करके बेटे को बुलाया।
राठौर घर पहुंचे और पत्र पढ़ा। उसमें उन्हें एक घंटे के भीतर बताए गए गांव में पहुंचने का निर्देश दिया गया था। मां को उन्होंने सामान्य रूप से बताया कि शायद कोई कमांडर मिलना चाहता है, लेकिन घर में घुसकर मां को जगाने और पत्र देने के तरीके को वह असामान्य मान रहे थे। इसके बावजूद वह अकेले बाइक से बताए गए गांव के लिए निकल पड़े। वहां नक्सली मिलिशिया के कमांडर ने उनसे पूछा कि वह अखबार में नक्सलियों के लिए ‘नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल क्यों करते हैं और मुठभेड़ में मारे गए सदस्यों के लिए ‘ढेर’ क्यों लिखा जाता है।
राठौर ने जवाब दिया कि वह ‘ढेर’ नहीं लिखते, बल्कि ‘मारे गए’ लिखते हैं, लेकिन बाद में संपादकीय स्तर पर खबर में बदलाव किया जाता है। कमांडर ने उनसे कहा कि आगे से नक्सलियों के लिए ‘माओवादी’ और मुठभेड़ में मारे गए सदस्यों के लिए ‘शहीद’ शब्द इस्तेमाल किया जाए। राठौर ने स्पष्ट किया कि खबर की भाषा तय करना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है और अंतिम संपादन ऊपर के संपादक करते हैं। उन्होंने कहा कि वह उनकी बात संपादकीय टीम तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन निर्णय की गारंटी नहीं दे सकते। कमांडर ने उनकी बात सुनकर उन्हें लौटने की अनुमति दे दी।
राठौर ने इस मुलाकात में घर पर उनकी मां को जिस तरीके से पत्र सौंपा गया, उस पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि परिवार इस घटना से डर गया था और यदि ऐसा दोबारा हुआ तो घरवाले उनकी पत्रकारिता छुड़वा सकते हैं। हालांकि, कमांडर ने इस बात पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया और उन्हें वापस जाने को कहा।
अपने संस्मरण में राजा सिंह राठौर लिखते हैं कि बस्तर में पत्रकारिता के दौरान उन्हें बार-बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जहां नक्सलियों और पुलिस दोनों की ओर से संदेह और दबाव का सामना करना पड़ता था। किसी एक पक्ष के करीब दिखने पर दूसरे पक्ष की नाराजगी का खतरा बना रहता था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी रिपोर्टिंग जारी रखी और घटनाओं को ईमानदारी से सामने लाने की कोशिश की।
राठौर ने बताया कि सोशल मीडिया के सक्रिय होने से पहले से वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़े थे, लेकिन लंबे समय तक खुद का कंटेंट बनाने से बचते रहे। उनका मानना था कि संस्थान के लिए रिपोर्टिंग करते समय किसी गलती की जिम्मेदारी संपादकीय व्यवस्था में तय हो सकती है, लेकिन खुद के मंच पर प्रकाशित सामग्री के लिए सीधे जवाबदेह होना पड़ता है। इसी कारण वह वर्षों तक अखबार और न्यूज चैनल के माध्यम से बस्तर में सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच संघर्ष की ग्राउंड रिपोर्टिंग करते रहे।
उन्होंने कहा कि नक्सलवाद के खात्मे के बाद भी बस्तर के अंदरूनी इलाकों की वास्तविक स्थिति सामने लाना उनकी जिम्मेदारी है। वह आगे भी टीवी चैनल, अखबार और सोशल मीडिया के माध्यम से क्षेत्र की ग्राउंड रिपोर्टिंग जारी रखने का प्रयास करेंगे।
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