गोविंद लोधा की हत्या ने खड़े किए सवाल, आखिर अपराध होने के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम?
बमौरी के गणेशपुरा में ऑटो चालक गोविंद लोधा की हत्या ने सिर्फ एक परिवार का चिराग नहीं बुझाया, बल्कि व्यवस्था के सामने एक बेहद कड़वा सवाल खड़ा कर दिया है।
गोविंद अपने गांव के युवक रवि लोधा को बदमाशों से बचाने के लिए बीच में आया था। बदमाशों ने उसे ही निशाना बना लिया। सरेराह चाकुओं से हमला किया गया। उसका ऑटो तोड़ा गया और रवि को भी गंभीर रूप से घायल कर दिया गया।
गोविंद अब नहीं है। लेकिन उसके जाने के बाद एक सवाल जिंदा है कि, अगर ग्रामीणों की शिकायतें पहले सुनी गई होतीं, अगर विवादों को समय रहते गंभीरता से लिया गया होता, अगर अपराधियों पर कानून का डर पहले पैदा किया गया होता, तो क्या आज गोविंद जिंदा नहीं होता?
ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके में कुछ लोग लंबे समय से विवाद करते रहे हैं। उनके खिलाफ शिकायतें होती रहीं। रास्ते पर अतिक्रमण और आए दिन होने वाले झगड़ों की बात भी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाई गई। लेकिन हुआ कुछ नहीं। इन आरोपों की जांच जरूरी है।
यदि शिकायतें सचमुच हुई थीं और कार्रवाई नहीं हुई, तो फिर यह सिर्फ बदमाशों के दुस्साहस का सवाल नहीं है। यह उस सिस्टम की भी जिम्मेदारी है, जो खतरे की आहट सुनकर भी समय पर नहीं जागा।
अपराध अचानक बड़ा नहीं होता। पहले गाली होती है। फिर धमकी होती है। फिर मारपीट होती है। फिर खुलेआम गुंडागर्दी शुरू होती है। और जब हर छोटी घटना पर कानून का डर खत्म हो जाता है, तब किसी गोविंद की हत्या हो जाती है।
इसलिए अपराध होने के बाद अपराधी पकड़ना ही पुलिस की सफलता नहीं है। असली सफलता तो तब है, जब अपराधी वारदात करने से पहले ही कानून के डर में हों।
बीट पुलिस और माइक्रो बीट व्यवस्था का मतलब सिर्फ कागजों में सूची बनाना नहीं है। गांव और मोहल्ले के उन लोगों की पहचान और नियमित निगरानी जरूरी है, जिनकी गतिविधियां लगातार विवाद और अपराध से जुड़ती रही हैं। पुलिस मैदान में दिखाई देगी, तभी आम आदमी को सुरक्षा का भरोसा मिलेगा।
CM मोहन यादव अपराधियों पर सख्ती और उनकी जमानत निरस्त कराने के निर्देश दे रहे हैं। इन निर्देशों की असली परीक्षा फाइलों में नहीं, गांव की गलियों में होगी।
गोविंद की हत्या के बाद अब सिर्फ यह पूछना काफी नहीं है कि उसे किसने मारा? यह भी पूछा जाना चाहिए कि, क्यों उनके हौसले इतने बढ़े? क्या पहले शिकायतें हुई थीं? अगर हुई थीं तो कार्रवाई क्या हुई? कहीं किसी स्तर पर लापरवाही तो नहीं हुई?
और अगर लापरवाही हुई, तो उसकी जवाबदेही कौन लेगा?
सांसद एवं केंद्रीय मंत्री के क्षेत्र में गुना पुलिस से उम्मीद है कि इस मामले की जांच सिर्फ हत्या के आरोपियों तक सीमित नहीं रहेगी। ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होगी और यदि कहीं शिकायतों की अनदेखी या लापरवाही सामने आती है तो विभाग के दोषियों की जिम्मेदारी भी तय होगी।
पुलिस अधीक्षक गुना हितिका वासल की संवेदनशील और निष्पक्ष कार्यशैली से लोगों को उम्मीद है कि इस घटना को सिर्फ एक और आपराधिक प्रकरण बनाकर बंद नहीं किया जाएगा, बल्कि इससे पुलिसिंग की कमियों की भी समीक्षा होगी।
क्योंकि गोविंद लोधा के परिवार के लिए यह कोई केस नंबर नहीं है। यह एक घर की बुझी हुई रोशनी है। एक परिवार की टूटी हुई दुनिया है। और शायद एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब अब सिस्टम को देना ही होगा। सवाल यह कि, “किसी निर्दोष की जान जाने के बाद ही पुलिस क्यों जागती है?”
गोविंद की मौत को सिर्फ हत्या मत समझिए।
इसे उस चेतावनी की तरह देखिए, जिसे अगर अब भी नहीं सुना गया, तो अगला गोविंद कौन होगा, कोई नहीं जानता।
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