चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की जांच की मांग, सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर
नई दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली में कथित संस्थागत कमियों की जांच और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। अधिवक्ता विशाल तिवारी की ओर से दाखिल याचिका में पूर्व मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने का अनुरोध किया गया है। याचिका में चुनाव प्रचार के दौरान धार्मिक पहचान, धार्मिक प्रतीकों, सांप्रदायिक अपील और नफरत भरे भाषणों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के निर्देश देने की मांग भी की गई है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रस्तावित समिति को चुनाव आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच कार्य आवंटन, निर्णयों का रिकॉर्ड रखने तथा असहमति दर्ज करने की व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए। समिति को यह भी जांचना चाहिए कि आयोग की मौजूदा संरचना, कर्मचारियों की संख्या और प्रशासनिक क्षमता उसके कामकाज के लिए पर्याप्त है या नहीं। याचिका में समिति को छह महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने और उसके बाद केंद्र सरकार तथा चुनाव आयोग से कार्रवाई संबंधी रिपोर्ट लेने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सामने आई खबरों का भी उल्लेख किया गया है। इसमें दावा किया गया है कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कुछ फैसलों पर लगभग 10 महीने के दौरान कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की थी। याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर मतदाता पंजीकरण के फॉर्म-6 में बदलाव, चुनावी डेटाबेस के केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में अपील दाखिल करने और कार्य आवंटन से जुड़े मामलों को संस्थागत समीक्षा की जरूरत से जोड़ा है। हालांकि, याचिका में यह भी स्पष्ट किया गया है कि आंतरिक असहमति अपने आप में किसी फैसले की अवैधता का प्रमाण नहीं है।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भी याचिका में चिंता जताई गई है। इसमें मीडिया रिपोर्टों के आधार पर कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से जुड़े मामलों में लगभग 38.20 लाख अपीलें दाखिल हुई थीं, जबकि संबंधित रिपोर्टिंग अवधि तक करीब 1.02 लाख अपीलों का निपटारा हुआ था। याचिकाकर्ता ने अपीलों के निपटारे में देरी को लेकर पर्याप्त न्यायाधिकरण, कर्मचारियों और समयबद्ध सुनवाई की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है। याचिका में यह भी कहा गया है कि अपीलों का लंबित रहना अपने आप में हर मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाए जाने का प्रमाण नहीं है, लेकिन समय पर राहत न मिलना मतदाता के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।
महाराष्ट्र की मसौदा मतदाता सूची में तकनीकी गड़बड़ी का मामला भी याचिका में उठाया गया है। इसके अनुसार, जन्म वर्ष से जुड़ी एक त्रुटि के कारण 2,70,313 मतदाताओं की आयु 101 से 150 वर्ष के बीच दर्ज दिखाई गई थी। याचिकाकर्ता ने इस उदाहरण के आधार पर चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराने, आंकड़ों की जांच के लिए स्वचालित व्यवस्था लागू करने और त्रुटियों को समय रहते सुधारने की जरूरत बताई है।
याचिका में मतदाता सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने के लिए आवेदन की पावती, आवेदन की स्थिति जानने की सुविधा, स्पष्ट नोटिस, कारण सहित निर्णय, समयबद्ध अपील निपटारा और जरूरतमंद मतदाताओं के लिए ऑफलाइन सहायता जैसी व्यवस्थाओं की सिफारिश करने की मांग भी की गई है। प्रस्तावित समिति में संवैधानिक कानून, चुनाव प्रशासन, सांख्यिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण के विशेषज्ञों को शामिल करने का सुझाव दिया गया है।
याचिका में चुनाव प्रचार के दौरान धार्मिक पहचान और प्रतीकों के इस्तेमाल के साथ सांप्रदायिक या जातीय आधार पर अपील तथा हेट स्पीच पर प्रभावी रोक लगाने की मांग भी शामिल है। याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनाव आयोग को मौजूदा कानूनों के तहत अपने अधिकारों का प्रभावी इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और सार्वजनिक विश्वास बनाए रखा जा सके।
याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया है कि यह जनहित याचिका भविष्य में चुनावी व्यवस्था में सुधार के उद्देश्य से दायर की गई है। इसमें किसी विशेष राजनीतिक दल या पदाधिकारी के खिलाफ दोष तय करने अथवा किसी चुनाव परिणाम को चुनौती देने की मांग नहीं की गई है। फिलहाल ये सभी मांगें याचिका का हिस्सा हैं; प्रस्तावित समिति के गठन और अन्य निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आना बाकी है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)