फतेहपुर में सालाना अशरये मजलिस शुरू, इमाम हुसैन को श्रद्धांजलि

Monday, August 18, 2025 - 11:08
Updated: 1 year ago
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फतेहपुर में सालाना अशरये मजलिस शुरू, इमाम हुसैन को श्रद्धांजलि

फतेहपुर (आरएनआई) शहर के बाकरगंज किला रोड, कर्बला के समीप स्थित आशूरा खाना सैय्यदा नरगिस आरा बेगम के मुन्तजिमे अशरा सैय्यद खुर्शीद असगर जैदी ने बताया कि इमाम हुसैन व उनके 72 साथियों की याद में सालाना अशरये मजलिस शनिवार से शुरू हो गई है। जो पच्चीस अगस्त तक लगातार चलेगी। '

उन्होने बताया कि पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब ने मानव मात्र को समता, एकता, शांति, सहयोग एवं भाईचारे का जो संदेश दिया था उसके फलस्वरूप अरब के निवासियों की आचार वली एवं जीवन दर्शन में भारी क्रांति आई थी। यजीद अपने दुराचार व व्यभिचार के लिए प्रसिद्ध था। मुसलमानों का खलीफा बन बैठा था। खलीफा मुसलमानों का धार्मिक एवं राजनैतिक नेता होता है लेकिन यजीद ऐसा व्यक्ति था जिसका धर्म से कोई संबंध नहीं था। अपने राजसी प्रभव का उपयोग करके बल व छल के प्रयोग से वह खलीफा बना। अपने पिता के मरने पर अभिषेक होते ही यजीद ने इमाम हुसैन से अपनी बैअत चाही। बैअत का अर्थ बिना किसी शर्त के आधीनता स्वीकार करना। इमाम हुसैन पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे थे। उनके पिता हजरत अली ने हर प्रकार से अपने भाई व संरक्षक हजरत मोहम्मद साहब का इस्लाम की धार्मिक क्रांति को फैलाने में सहयोग दिया था। ऐसी दशा में यदि इमाम हुसैन यजीद की आधीनता स्वीकार कर लेते तो यह क्रांति दीप सदा सर्वदा के लिए बुझ जाता। उन्होने कहा कि इमाम हुसैन सच्चाई और धर्म के प्रति अपनी वफादारी व पैतृक परम्पराओं के कारण यजीद की बैअत कर ही नहीं सकते थे, क्योंकि यह असत्य व अधर्म के सामने सिर झुकाना था। लिहाजा इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में अपनी, अपने परिवार व अपने साथियों की कुर्बानी देकर अपना सर्वस्व लुटाकर धर्म एवं मानवता की रक्षा का महान कर्तव्य पूरा किया। उन्होने बताया कि सालाना मजलिस का 38 वां दौर इमाम हुसैन व उनके साथियों को श्रद्धांजलि अर्पित किए जाने के लिए लगातार 25 अगस्त तक चलेगा। मजलिस में बाहर से आए मौलाना ने खेताब किया।

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