वैकल्पिक नौकरी देनी चाहिए थी: घायल जवान को हटाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीएफ को लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने ड्यूटी के दौरान दृष्टिहीन हुए एक पूर्व सीआरपीएफ कांस्टेबल को सेवा से हटाने के मामले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की कड़ी आलोचना की है। अदालत ने कहा कि बल को जवान को नौकरी से हटाने के बजाय उसकी क्षमता के अनुरूप वैकल्पिक पद पर समायोजित करना चाहिए था। न्यायालय ने पूर्व कांस्टेबल को 1.25 करोड़ रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने केंद्र सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने माना था कि सीआरपीएफ ने दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 47 का उल्लंघन किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीआरपीएफ एक आदर्श नियोक्ता के रूप में अपने दायित्व का पालन करने में विफल रहा। अदालत के अनुसार, सेवा के दौरान दृष्टिहीन हुए कांस्टेबल को चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित कर हटाने के बजाय समान वेतन और सेवा लाभ वाले किसी अन्य पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए था।
अदालत ने पूर्व कांस्टेबल को 1.25 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसमें बकाया वेतन, ब्याज और मुकदमे की लागत शामिल है। हालांकि, हाई कोर्ट के बहाली के आदेश में संशोधन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि संबंधित कर्मचारी अब सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुके हैं, इसलिए उन्हें दोबारा सेवा में बहाल करना संभव नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि दिव्यांगजन अधिनियम की धारा 47 अनिवार्य प्रकृति की है। यदि किसी सरकारी कर्मचारी को सेवा के दौरान शारीरिक दिव्यांगता हो जाती है, तो उसे समान वेतन और सुविधाओं वाले किसी अन्य पद पर स्थानांतरित किया जाना चाहिए। यदि ऐसा संभव न हो, तो नियोक्ता को उसके लिए सुपरन्यूमेरी (अतिरिक्त) पद सृजित कर समायोजन करना चाहिए।
पीठ ने सीआरपीएफ की ओर से 2002 की अधिसूचना का हवाला दिए जाने को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि संबंधित कर्मचारी को वर्ष 1998 में चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित किया गया था, जबकि छूट देने वाली अधिसूचना 2002 में जारी हुई थी। इसलिए उसे पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करना प्रत्येक सरकारी संस्था की जिम्मेदारी है।
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