मैदानी अफसरों पर सख्त हुए मुख्य सचिव अनुराग जैन, भ्रष्टाचार पर सीधे संदेश में सीएम और पीएमओ का जिक्र
मध्यप्रदेश (आरएनआई) मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में उस समय हलचल मच गई, जब मुख्य सचिव अनुराग जैन ने मैदानी अधिकारियों के साथ कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान भ्रष्टाचार को लेकर बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। 7 और 8 अक्टूबर को हुई कलेक्टर-कमिश्नर कॉन्फ्रेंस के 85 बिंदुओं की जिलेवार समीक्षा के दौरान उन्होंने कमजोर प्रदर्शन वाले जिलों को फटकार लगाई और स्पष्ट संकेत दिया कि अब लापरवाही और अनियमितताओं को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
बैठक में टॉप थ्री और बॉटम थ्री जिलों का जिक्र करते हुए महिला सुरक्षा और नाबालिग बालिकाओं की तलाश से जुड़े ‘मुस्कान अभियान’ की प्रगति की भी समीक्षा की गई। इसी दौरान मुख्य सचिव ने कई जिलों में कलेक्टरों के खिलाफ मिल रही शिकायतों पर नाराजगी जाहिर की और कहा कि यह मानकर न चलें कि सब कुछ छिपा रह जाता है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि किस जिले में क्या हो रहा है, इसकी पूरी जानकारी शासन के उच्च स्तर तक रहती है।
अनुराग जैन ने अधिकारियों को यह भी याद दिलाया कि प्रदेश के प्रशासनिक फैसलों और गतिविधियों पर प्रधानमंत्री कार्यालय की नजर रहती है। उन्होंने कहा कि चाहे कोई कलेक्टर नवाचार करे या फिर किसी तरह की गड़बड़ी में शामिल हो, उसकी जानकारी पीएमओ तक पहुंचती है। इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री भी कलेक्टरों की गतिविधियों से अवगत रहते हैं। मुख्य सचिव ने यह भी उल्लेख किया कि कई बार मुख्यमंत्री स्वयं यह कहते हैं कि प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठने की वजह अफसरों का आचरण है, इसलिए जरूरी है कि अधिकारी अपने व्यवहार और कार्यप्रणाली को लेकर बेहद सतर्क रहें।
मुख्य सचिव ने यह भी कहा कि अधिकारियों के काम को केवल राज्य के भीतर ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों के नेता और वरिष्ठ अफसर भी देखते हैं। वहां से मिलने वाला फीडबैक कई बार किसी जिले या अधिकारी की वास्तविक स्थिति को उजागर कर देता है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जिन जिलों की शिकायतें शासन और मुख्यमंत्री तक पहुंच चुकी हैं, वे समय रहते सुधार कर लें।
यह पूरी बैठक उस समय हुई, जब मुख्यमंत्री मोहन यादव विदेश दौरे पर थे। ऐसे में मुख्य सचिव का इतना तीखा और सीधा रुख कई सवाल खड़े कर रहा है। आमतौर पर कलेक्टरों और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने खुले तौर पर भ्रष्टाचार और पैसे लेने जैसी बातें कहना असामान्य माना जाता है। लेकिन जिस तरह से ये मुद्दे सामने आए, उसने प्रशासन में व्याप्त असंतोष और अंदरूनी तनाव को उजागर कर दिया।
प्रदेश में लंबे समय से यह चर्चा आम है कि पोस्टिंग, तबादलों और प्रभारों को लेकर रेट तय हैं और बिना लेन-देन के काम होना मुश्किल है। हालांकि ये बातें अक्सर चर्चाओं तक सीमित रहती हैं, लेकिन जब खुद प्रदेश का प्रशासनिक मुखिया ऐसी बातों का सार्वजनिक मंच पर जिक्र करे, तो इन चर्चाओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं रह जाता।
इस पूरे घटनाक्रम को उस पृष्ठभूमि में भी देखा जा रहा है, जहां मुख्य सचिव अनुराग जैन की नियुक्ति और विस्तार को लेकर मुख्यमंत्री की सहमति न होने की बातें पहले भी सामने आ चुकी हैं। सीएम और सीएस के बीच मतभेदों की चर्चा समय-समय पर सार्वजनिक होती रही है। हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य सचिव की अनुपस्थिति पर मुख्यमंत्री की टिप्पणी ने भी इन अटकलों को और हवा दी थी।
ऐसे में सवाल यही उठ रहा है कि क्या मुख्य सचिव का यह सख्त संदेश केवल अधिकारियों को चेतावनी देने के लिए था, या इसके जरिए शासन के भीतर चल रही असहजता और जवाबदेही के दबाव की झलक भी सामने आई है। फिलहाल इतना तय है कि इस कॉन्फ्रेंस के बाद मध्यप्रदेश का प्रशासनिक तंत्र एक बार फिर कठघरे में खड़ा नजर आ रहा है।
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