महिला दिवस विशेष: सहरिया आदिवासी महिलाओं के संघर्ष की अनकही कहानी
शिवपुरी (आरएनआई)। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जहां देश-दुनिया में महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के जंगलों और बीहड़ों में रहने वाली सहरिया जनजाति की महिलाएं आज भी आधुनिक भारत की चकाचौंध से दूर कठिन जीवन जीने को मजबूर हैं। इन बस्तियों में रहने वाली सहरिया महिलाओं का जीवन कुपोषण, हाड़तोड़ मेहनत और शोषण की त्रिकोणीय मार के बीच गुजर रहा है।
सहरिया समुदाय में कुपोषण एक अभिशाप की तरह पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। यहां की अधिकांश महिलाएं स्वयं कुपोषित हैं, जिसके कारण वे अक्सर कमजोर और बीमार बच्चों को जन्म देती हैं। पौष्टिक भोजन की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच के कारण इन महिलाओं का शरीर समय से पहले ही कमजोर और जर्जर हो जाता है। उनके लिए जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष पेट की भूख मिटाना ही बन जाता है।
एक सहरिया महिला का दिन सूर्योदय से पहले शुरू होता है और देर रात तक चलता है। वे जंगलों से लकड़ी और जड़ी-बूटियां इकट्ठा करती हैं, साथ ही पत्थर की खदानों और खेतों में भी मजदूरी करती हैं। इतनी कठिन मेहनत के बावजूद उन्हें न तो उचित पारिश्रमिक मिलता है और न ही वह सम्मान जिसकी वे हकदार हैं। परिवार के पालन-पोषण का अधिकांश बोझ उनके कंधों पर होता है, लेकिन परिवार और समाज के बड़े फैसलों में उनकी भागीदारी आज भी बहुत सीमित है।
गरीबी और शिक्षा के अभाव के कारण सहरिया महिलाएं अक्सर बिचौलियों और दबंगों के शोषण का शिकार हो जाती हैं। मजदूरी में भेदभाव और सामाजिक बंधनों ने उन्हें एक ऐसे दुष्चक्र में फंसा दिया है, जहां से बाहर निकलना उनके लिए आसान नहीं रहा।
इन कठिन परिस्थितियों के बीच “सहरिया क्रांति जै आंदोलन” ने इन महिलाओं के जीवन में बदलाव की उम्मीद जगाई है। इस पहल के माध्यम से महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा रहा है और उन्हें संगठित होकर शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इस आंदोलन के प्रभाव से कई महिलाएं अब अपने अधिकारों के लिए आगे आ रही हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने का प्रयास कर रही हैं।
हालांकि मंजिल अभी दूर है, लेकिन इन महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्वास ने यह साबित कर दिया है कि सही मार्गदर्शन और सहयोग मिलने पर वे अपनी परिस्थितियों को बदलने की क्षमता रखती हैं।
महिला दिवस की वास्तविक सार्थकता तभी होगी जब शिवपुरी की इन सहरिया महिलाओं को भी सम्मानजनक जीवन, भरपेट भोजन और शोषण से मुक्त समाज मिल सके। तभी सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण का सपना पूरा हो पाएगा।
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