इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ लंबे समय तक कब्जा रहने से सार्वजनिक संपत्ति पर नहीं बनता कानूनी अधिकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अलीगढ़ नगर निगम की भूमि पर बने आवासीय क्वार्टरों को खाली कराने के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि **बिना वैध दस्तावेज के केवल लंबे समय तक किसी सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जे में रहने से उस पर कोई कानूनी अधिकार स्थापित नहीं हो जाता।** अदालत ने नगर आयुक्त के बेदखली आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।
यह फैसला न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने सुनाया। शफीकुर रहमान समेत सात याचिकाकर्ताओं ने 15 मई 2026 को नगर आयुक्त द्वारा पारित बेदखली आदेश और 6 जून 2026 को जारी नोटिस को चुनौती दी थी। यह नोटिस अलीगढ़ के मौजा डोडपुर माफी स्थित नजूल प्लॉट संख्या 78 और 87 पर बने नगर निगम के आवासीय क्वार्टर खाली करने के लिए जारी किया गया था।
याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उनके पूर्वजों को ये क्वार्टर नगर निगम द्वारा किराये पर दिए गए थे और वे नियमित रूप से किराया जमा करते रहे। उनका यह भी कहना था कि उन्होंने नगर निगम के प्रस्ताव के अनुसार फ्रीहोल्ड के लिए निर्धारित राशि भी जमा कर दी थी, इसलिए उन्हें बेदखल नहीं किया जा सकता।
वहीं नगर निगम ने अदालत में कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास ऐसा कोई वैध दस्तावेज नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि उन्हें कभी विधिवत आवास आवंटित किया गया था या वे अधिकृत किरायेदार हैं। निगम ने उन्हें अवैध कब्जाधारी बताया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता अपने कब्जे को वैध साबित करने वाला कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सके। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन रसीदों के आधार पर फ्रीहोल्ड का दावा किया गया, वे किसी कानूनी अधिकार की पुष्टि नहीं करतीं और न ही इससे यह सिद्ध होता है कि नगर निगम ने उन्हें विधिवत किरायेदार के रूप में स्वीकार किया था। इन आधारों पर अदालत ने बेदखली नोटिस में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
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