भारतीय पत्रकारिता में एकता का अभाव क्यों? साथी पत्रकार के अधिकारों पर चोट के बावजूद संगठनात्मक आवाज क्यों नहीं उठती
भारतीय पत्रकारिता के सामने आज केवल सत्ता, कानून या संस्थागत दबाव की चुनौती नहीं है, बल्कि पत्रकारों के बीच पेशेवर एकता और आपसी सहयोग का अभाव भी एक गंभीर सवाल बनकर सामने आता है। अक्सर किसी पत्रकार के अधिकारों, सम्मान या पेशेवर स्वतंत्रता पर चोट होती है, लेकिन व्यापक स्तर पर पत्रकार समुदाय की संगठित प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती।
स्थिति यह है कि किसी पत्रकार के साथ कार्रवाई होती है, उसका पेशेवर अधिकार प्रभावित होता है या उसे किसी विवाद का जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, तो मामला कुछ समय के लिए खबर जरूर बनता है। लेकिन खबर बनने और सामूहिक आवाज उठाने के बीच बड़ा अंतर है। यदि पत्रकार संगठन और पूरा मीडिया समुदाय ऐसे मामलों में एकजुट होकर लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराए, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।
अमेरिका का उदाहरण अक्सर इस संदर्भ में दिया जाता है। वहां एक पत्रकार के व्हाइट हाउस प्रवेश अधिकार को लेकर विवाद के बाद पत्रकार समुदाय और मीडिया संस्थानों की ओर से विरोध सामने आया। इस घटना ने यह बहस खड़ी की कि किसी एक पत्रकार के अधिकारों पर कार्रवाई को केवल व्यक्तिगत मामला मानने के बजाय प्रेस की स्वतंत्रता के व्यापक सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया में भी मीडिया की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर समाचार संस्थानों द्वारा सामूहिक विरोध के प्रतीकात्मक तरीके अपनाए जाने के उदाहरण सामने आए हैं। ऐसे विरोध यह संदेश देते हैं कि किसी पत्रकार या मीडिया संस्थान पर दबाव को केवल उसी व्यक्ति या संस्थान की समस्या मानकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
भारत में भी पत्रकारों को किसी मामले में निशाना बनाए जाने पर केवल खबर प्रकाशित करने या प्रसारित करने तक सीमित रहने के बजाय पत्रकार संगठनों को लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में सामूहिक आवाज उठाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। सवाल यह है कि यदि पत्रकार ही अपने पेशेवर साथी के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए एकजुट नहीं होंगे, तो फिर उनसे जुड़े व्यापक अधिकारों और स्वतंत्रता की लड़ाई मजबूत कैसे होगी?
पत्रकारिता केवल खबर लिखने और प्रसारित करने का पेशा नहीं है। यह लोकतंत्र में सवाल पूछने, सत्ता और संस्थाओं को जवाबदेह बनाने तथा नागरिकों तक तथ्य पहुंचाने की जिम्मेदारी भी है। इसलिए पत्रकारों के पेशेवर अधिकारों और सम्मान से जुड़े मामलों में एकजुटता केवल पत्रकार समुदाय का आंतरिक विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है।
अब जरूरत इस बात की है कि किसी पत्रकार के साथ होने वाली कार्रवाई को केवल एक दिन की खबर बनाकर छोड़ने के बजाय उसके तथ्य, कानूनी स्थिति और पेशेवर अधिकारों पर गंभीर चर्चा हो। संगठित, तथ्यपरक और शांतिपूर्ण विरोध ही पत्रकार समुदाय की सामूहिक शक्ति को प्रभावी रूप से सामने ला सकता है।
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