किचन स्पंज बना अदृश्य खतरा: बर्तन धोने से निकल रहा माइक्रोप्लास्टिक, बढ़ रहा प्रदूषण
नई दिल्ली (आरएनआई)। रसोई में रोज इस्तेमाल होने वाला साधारण किचन स्पंज अब एक गंभीर पर्यावरणीय खतरे के रूप में सामने आया है। एक हालिया अध्ययन में खुलासा हुआ है कि बर्तन धोते समय स्पंज के घिसने से माइक्रोप्लास्टिक के बेहद सूक्ष्म कण निकलते हैं, जो पानी के साथ बहकर नदियों, मिट्टी और यहां तक कि खाद्य श्रृंखला तक पहुंच रहे हैं।
प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल एनवायर्नमेंटल एडवांसेज में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, एक व्यक्ति द्वारा सालभर में इस्तेमाल किए गए स्पंज से 0.68 ग्राम से 4.21 ग्राम तक माइक्रोप्लास्टिक निकल सकता है। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर इनका असर बेहद गंभीर हो सकता है।
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि बर्तन धोने से होने वाले कुल पर्यावरणीय प्रभाव में सिर्फ माइक्रोप्लास्टिक ही नहीं, बल्कि पानी की अत्यधिक खपत भी बड़ी भूमिका निभाती है, जो कुल प्रभाव का 85 से 97 प्रतिशत तक हिस्सा बनाती है। यानी रोजमर्रा की यह आदत जल संसाधनों पर भी भारी दबाव डाल रही है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, स्पंज के इस्तेमाल के दौरान उसकी सतह धीरे-धीरे घिसती है, जिससे प्लास्टिक के सूक्ष्म कण निकलते हैं। ये कण नालियों के जरिए जल स्रोतों में पहुंचते हैं और अंततः खाद्य श्रृंखला में शामिल होकर मानव शरीर तक भी पहुंच सकते हैं। पहले के शोधों में मानव रक्त और शरीर के विभिन्न अंगों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी के प्रमाण मिल चुके हैं, जिससे इस समस्या को लेकर चिंता और बढ़ गई है।
जर्मनी और उत्तरी अमेरिका के घरों में किए गए अध्ययन में पाया गया कि यदि बर्तनों को अधिक जोर से रगड़कर धोया जाए, तो स्पंज तेजी से घिसता है और अधिक माइक्रोप्लास्टिक निकलता है। बड़े स्तर पर यह मात्रा हर साल कई टन तक पहुंच सकती है, जो पर्यावरण के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
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