कपिल सिब्बल का सरकार पर हमला: अध्यादेश से जजों की संख्या बढ़ाना अलोकतांत्रिक, संसद में होनी चाहिए थी बहस
पूर्व कानून मंत्री और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने केंद्र सरकार द्वारा अध्यादेश के जरिए जजों की संख्या बढ़ाने के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर संसद में चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन सरकार ने बहस से बचते हुए अध्यादेश का रास्ता अपनाया, जो लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है।
नई दिल्ली में आयोजित एक मीडिया वार्ता में सिब्बल ने कहा कि यह फैसला भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व वाली सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने इसे “अलोकतांत्रिक व्यवहार” बताते हुए कहा कि सरकार को विपक्ष और न्यायपालिका से जुड़े विशेषज्ञों को भरोसे में लेना चाहिए था।
सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि वर्ष 1950 में सुप्रीम कोर्ट में केवल सात जज हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ यह संख्या लगातार बढ़ती गई और अब मुख्य न्यायाधीश समेत कुल जजों की संख्या 37 तक पहुंच चुकी है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर न्याय व्यवस्था किस दिशा में जा रही है और जजों की संख्या बढ़ाने के पीछे दिए जा रहे तर्क कितने उचित हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल ने अदालतों में बढ़ते मुकदमों के लिए सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था कि सरकार देश की सबसे बड़ी वादी बन चुकी है और अधिकांश मुकदमे सरकारी नीतियों व कार्रवाइयों के कारण ही अदालतों तक पहुंचते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने कई कठोर कानून बनाए हैं और प्रवर्तन निदेशालय (ED) तथा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल “हथियार” की तरह किया जा रहा है। सिब्बल के मुताबिक, इन कारणों से अदालतों में मुकदमों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जनहित याचिकाओं (PIL) की बढ़ती संख्या ने भी न्यायपालिका पर दबाव बढ़ाया है।
कपिल सिब्बल ने कहा कि अध्यादेश लाकर सरकार ने संसद में गंभीर बहस की संभावना खत्म कर दी। उन्होंने सुझाव दिया कि इस फैसले से पहले विपक्ष, रिटायर्ड जजों और कानूनी विशेषज्ञों से राय ली जानी चाहिए थी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार इसी तरह बिना सहमति और संवाद के फैसले लेती रही, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख को नुकसान पहुंच सकता है।
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