तिब्बत में चीन की नीतियों को समझाती यह खास किताब

नव ठाकुरीया

Friday, June 19, 2026 - 11:22
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तिब्बत में चीन की नीतियों को समझाती यह खास किताब

एक जागरूक भारतीय नागरिक के लिए चीन आज भी एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति के रूप में देखा जाता है जिसने सात दशक पहले तिब्बत पर कब्ज़ा कर भारत की उत्तरी सीमाओं तक अपनी पहुंच बनाई। भले ही नई दिल्ली की आधिकारिक नीति स्वतंत्र तिब्बत की अवधारणा का समर्थन नहीं करती हो, लेकिन भारत सहित दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोग अब भी मानते हैं कि तिब्बती जनता को अपने राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ जीने का अवसर मिलना चाहिए। दूसरी ओर, बीजिंग की कम्युनिस्ट सरकार तिब्बत के संसाधनों और रणनीतिक महत्व को देखते हुए वहां अपने नियंत्रण को बनाए रखने के लिए हर प्रकार के विरोध को दबाने का प्रयास करती रही है।

इसी पृष्ठभूमि में प्रकाशित पुस्तक ‘China’s Colonial Games in Tibet’ तिब्बत के प्रश्न को नए सिरे से वैश्विक विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास करती है। वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और तिब्बत मामलों के जानकार विजय क्रांति द्वारा संपादित यह पुस्तक VK Media Group द्वारा Center for Himalayan Asia Studies and Engagement (CHASE) के लिए प्रकाशित की गई है। 486 पृष्ठों की यह हार्डबाउंड पुस्तक केवल एक संकलन नहीं, बल्कि तिब्बत के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोणों, अनुभवों और शोधपरक विश्लेषणों का व्यापक दस्तावेज़ है।

पुस्तक में तिब्बत और चीन से जुड़े लगभग 39 प्रतिष्ठित विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, राजनयिकों और रणनीतिक मामलों के जानकारों के करीब 60 लेख शामिल हैं। यह सामग्री वर्ष 2020 से 2023 के बीच नई दिल्ली स्थित थिंक-टैंक CHASE द्वारा आयोजित 30 से अधिक अंतरराष्ट्रीय वेबिनारों और चर्चाओं से संकलित की गई है। इन लेखों में तिब्बत के अलावा पूर्वी तुर्किस्तान, दक्षिणी मंगोलिया, हांगकांग और मंचूरिया जैसे क्षेत्रों में चीन की नीतियों और उसके औपनिवेशिक दृष्टिकोण की भी पड़ताल की गई है।

विजय क्रांति, जिन्हें लंबे समय से तिब्बती आंदोलन के समर्थक और संवेदनशील पर्यवेक्षक के रूप में जाना जाता है, ने पुस्तक के माध्यम से उन आवाज़ों को मंच देने का प्रयास किया है जो अक्सर वैश्विक विमर्श में उपेक्षित रह जाती हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि यह परियोजना केवल तिब्बत तक सीमित नहीं रहेगी और भविष्य में चीन के नियंत्रण वाले अन्य क्षेत्रों पर भी इसी प्रकार के अध्ययन प्रकाशित किए जाएंगे। पुस्तक की तैयारी के दौरान तिब्बती यूथ कांग्रेस (TYC) के सहयोग को भी उन्होंने विशेष रूप से स्वीकार किया है।

इस संकलन में भूचुंग त्सेरिंग, क्लाउड अर्पी, डेचेन पाल्मो, एलेनोर बायरन-रोसेनग्रेन, एंगेबातु तोगोचोग, एनवर तोहती, एथन गुटमैन, गेब्रियल लाफिटे, गेशे ल्हाकडोर, जयदेव रानाडे, जेनिफर ज़ेंग, ल्हाडोन टेथोंग, ल्हाग्यारी नामग्याल डोलकर, थुबटेन साम्पेल, थिनले चुक्की और तेनज़िन पासांग जैसे अनेक विशेषज्ञों के लेख शामिल हैं। इसके अतिरिक्त प्रोफेसर रॉबर्ट डेस्ट्रो, प्रोफेसर समधोंग रिनपोछे और सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (CTA) के अध्यक्ष पेनपा त्सेरिंग जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों के विचार भी पुस्तक को विशेष महत्व प्रदान करते हैं।

पुस्तक के विभिन्न लेख इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि तिब्बतियों को उनके राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकार मिलने चाहिए, ताकि दशकों से जारी असुरक्षा और मानसिक पीड़ा को कम किया जा सके। इसमें उन दुखद घटनाओं का भी उल्लेख है जिनमें 150 से अधिक तिब्बती युवाओं ने विरोध स्वरूप आत्मदाह किया। पुस्तक यह सवाल भी उठाती है कि जिन वैश्विक शक्तियों और संगठनों ने दुनिया के अन्य हिस्सों में मानवाधिकार और सांस्कृतिक विरासत के मुद्दों पर मुखरता दिखाई, वे तिब्बत में हो रहे कथित सांस्कृतिक क्षरण और धार्मिक स्थलों के विनाश पर अपेक्षाकृत मौन क्यों रहे।

नई दिल्ली से इस लेखक से बातचीत में विजय क्रांति ने कहा कि पुस्तक का उद्देश्य तिब्बती समाज के सामने मौजूद औपनिवेशिक चुनौतियों, सांस्कृतिक दबावों और राजनीतिक प्रश्नों का तथ्याधारित दस्तावेज़ प्रस्तुत करना है। उनके अनुसार, दशकों से तिब्बती आबादी के पुनर्वास, निगरानी व्यवस्था, वैचारिक पुनर्शिक्षण कार्यक्रमों और राजनीतिक नियंत्रण जैसी नीतियों ने तिब्बती समाज को गहराई से प्रभावित किया है। उनका मानना है कि तिब्बती नेतृत्व और चीनी सरकार के बीच सार्थक संवाद की संभावनाएं सीमित रही हैं, इसलिए तिब्बतियों को अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय समर्थन का विवेकपूर्ण आकलन करते रहना चाहिए।

पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसकी भूमिका (Foreword) है, जिसे परम पावन 14वें दलाई लामा ने लिखा है। अपने संदेश में उन्होंने तिब्बती पठार के पर्यावरणीय महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा है कि तिब्बत, जिसे वैज्ञानिक “तीसरा ध्रुव” (Third Pole) भी कहते हैं, एशिया की अनेक प्रमुख नदियों का स्रोत है और एक अरब से अधिक लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। इसलिए तिब्बती पठार का संरक्षण केवल तिब्बत का नहीं, बल्कि समूचे एशिया और विश्व का प्रश्न है।

दलाई लामा ने अपनी मातृभूमि और तिब्बती जनता के हितों की रक्षा के लिए किए गए प्रयासों का उल्लेख करते हुए विश्वास व्यक्त किया है कि सत्य और न्याय पर आधारित संवाद के माध्यम से तिब्बत के लंबे संघर्ष का शांतिपूर्ण एवं सम्मानजनक समाधान संभव है। उन्होंने आशा जताई है कि यह पुस्तक तिब्बत के बारे में बेहतर समझ विकसित करने और पारस्परिक सम्मान पर आधारित सार्थक संवाद को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी।

कुल मिलाकर, ‘China’s Colonial Games in Tibet’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि तिब्बत के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर केंद्रित एक गंभीर संदर्भ ग्रंथ है। शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, कूटनीतिज्ञों, सुरक्षा विशेषज्ञों और उन सभी पाठकों के लिए यह एक उपयोगी दस्तावेज़ है जो तिब्बत और चीन के जटिल संबंधों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहते हैं।

लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार

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