ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को एनजीटी की हरी झंडी, विकास बनाम पर्यावरण पर फिर छिड़ी बहस

Tuesday, February 17, 2026 - 15:24
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ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को एनजीटी की हरी झंडी, विकास बनाम पर्यावरण पर फिर छिड़ी बहस

नई दिल्ली (आरएनआई)। राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने ग्रेट निकोबार द्वीप में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल समेत बहुप्रतीक्षित मेगा अवसंरचना परियोजना को मंजूरी दे दी है। ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा है कि परियोजना को दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं और मौजूदा चरण में किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। कोलकाता स्थित पूर्वी जोनल बेंच, जिसकी अध्यक्षता एनजीटी चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश प्रकाश श्रीवास्तव कर रहे थे, ने यह आदेश पारित किया।

एनजीटी ने स्पष्ट किया कि इस परियोजना को लेकर पहले भी आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं, लेकिन उन पर सुनवाई के दौरान पर्यावरणीय मंजूरी में हस्तक्षेप से इनकार किया गया था। ट्रिब्यूनल के अनुसार, जिन कमियों और चिंताओं की पहचान की गई थी, उन्हें उच्चस्तरीय समिति द्वारा संबोधित किया जा चुका है। अदालत ने यह भी माना कि यह परियोजना राष्ट्रीय और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, हालांकि इसके साथ पर्यावरणीय सुरक्षा से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा।

ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट के तहत एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, टाउनशिप और क्षेत्रीय विकास से जुड़ी योजनाएं, साथ ही 450 मेगावाट क्षमता का गैस एवं सौर ऊर्जा आधारित पावर प्लांट स्थापित किया जाना प्रस्तावित है। इससे पहले इस परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी को यह कहते हुए चुनौती दी गई थी कि इसमें आइलैंड कोस्टल रेगुलेशन जोन यानी आईसीआरजेड नियमों का उल्लंघन हुआ है।

अपने आदेश में एनजीटी ने कहा कि पर्यावरणीय स्वीकृति में कई महत्वपूर्ण संरक्षण उपायों को अनिवार्य किया गया है। इनमें लेदरबैक समुद्री कछुओं के संरक्षण, निकोबार मेगापोड पक्षी, खारे पानी के मगरमच्छ, निकोबार मकाक और रॉबर क्रैब जैसे दुर्लभ जीवों की सुरक्षा शामिल है। इसके साथ ही मैंग्रोव पुनर्स्थापन, कोरल ट्रांसलोकेशन और शोम्पेन व निकोबारी जनजातियों के हितों की रक्षा पर भी विशेष जोर दिया गया है। ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिया कि तटरेखा में किसी भी प्रकार का कटाव या अप्राकृतिक परिवर्तन न हो और द्वीप के रेतीले समुद्र तट सुरक्षित रखे जाएं, क्योंकि ये कछुओं और पक्षियों के लिए अहम घोंसला स्थल हैं।

एनजीटी ने यह भी कहा कि परियोजना के रणनीतिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन आईसीआरजेड अधिसूचना की शर्तों की अनदेखी भी संभव नहीं है। इसलिए विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य होगा। ट्रिब्यूनल ने संबंधित प्राधिकरणों को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि पर्यावरणीय शर्तों का कड़ाई से पालन किया जाए और परियोजना की लगातार निगरानी हो।

भारत के लिए ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को दीर्घकालिक सामरिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है। यह द्वीप हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत कर सकता है। खास बात यह है कि ग्रेट निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। इस भौगोलिक स्थिति के चलते भारत को अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर मिल सकता है।

रक्षा के नजरिए से भी यह परियोजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यहां बुनियादी ढांचे के विकास से भारत की सैन्य क्षमताओं को मजबूती मिलेगी और हिंद महासागर क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी संभव हो सकेगी। आपदा प्रबंधन और आपात स्थितियों में भी ग्रेट निकोबार की उपयोगिता बढ़ेगी, क्योंकि यह त्वरित सैन्य तैनाती और प्रतिक्रिया के लिए एक मजबूत आधार बन सकता है।

हालांकि, इस परियोजना को लेकर विरोध भी कम नहीं रहा है। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत कई पर्यावरणविदों ने इस पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि परियोजना के कारण बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई हो सकती है, जिसका अनुमान 8.5 लाख से लेकर 58 लाख पेड़ों तक लगाया गया है। इतनी व्यापक कटाई से क्षेत्र का पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट होने और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।

इसके अलावा, ग्रेट निकोबार क्षेत्र में मौजूद कोरल रीफ यानी मूंगे की चट्टानों को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि निर्माण गतिविधियों के चलते ये कोरल रीफ क्षतिग्रस्त होती हैं, तो समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है। ऐसे में एनजीटी की मंजूरी के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाते हुए पर्यावरण संरक्षण के दावों को जमीन पर कितनी सख्ती और ईमानदारी से लागू किया जाता है।

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