PAK ने सऊदी-तुर्किये से बढ़ाए दोस्ती के हाथ, फिर भी भारत क्यों बेफिक्र? विशेषज्ञों का आकलन
मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए संयुक्त रक्षा समझौते के बाद सवाल उठ रहे हैं कि किसी आतंकी हमले की स्थिति में पाकिस्तान के खिलाफ भारत की सैन्य कार्रवाई कितनी जटिल हो सकती है। समझौते में यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी एक देश के खिलाफ हमला तीनों देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से भारत के लिए सैन्य कार्रवाई की राह जरूरी नहीं कि उतनी मुश्किल हो जाए, जितनी पहली नजर में दिखाई देती है। भूराजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ कमर आगा के मुताबिक, तुर्किये और सऊदी अरब के भारत के खिलाफ सीधे सैन्य संघर्ष में शामिल होने की संभावना कम है।
उन्होंने कहा कि तुर्किये के लिए इतनी दूर आकर भारत के खिलाफ लड़ना व्यावहारिक नहीं होगा। साथ ही पाकिस्तान और तुर्किये की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं है। उनके अनुसार, दोनों देशों के लिए सऊदी अरब से आर्थिक सहयोग हासिल करना महत्वपूर्ण है।
कमर आगा ने यह भी कहा कि सऊदी अरब की भारत पर काफी आर्थिक निर्भरता है और भारत उसके तेल का बड़ा खरीदार है। ऐसे में भारत और सऊदी अरब के बीच मजबूत आर्थिक संबंधों को देखते हुए यह जरूरी नहीं कि रक्षा समझौता दोनों देशों के संबंधों को सीधे सैन्य टकराव की स्थिति तक ले जाए।
विशेषज्ञों के आकलन के अनुसार, किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई में भारत के सामने राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौतियां जरूर बढ़ सकती हैं, लेकिन केवल इस रक्षा समझौते के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत के लिए पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई पूरी तरह मुश्किल हो जाएगी।
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