AI प्रोपेगेंडा से भारत को निशाना: पाकिस्तान की डीपफेक साजिश का खुलासा
नई दिल्ली (आरएनआई): नई दिल्ली में हुई खुफिया जांच में पाकिस्तान की एक संगठित डिजिटल साजिश का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल कर भारत की छवि खराब करने की कोशिश की गई। जांच में सामने आया है कि फर्जी वीडियो और भ्रामक नैरेटिव के जरिए देश में भ्रम, असंतोष और संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने की रणनीति अपनाई गई।
सूत्रों के मुताबिक हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर सेना और वायुसेना से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के एआई-जनित वीडियो तेजी से फैलाए गए। इन डीपफेक वीडियो में अधिकारियों को ऐसे बयान देते हुए दिखाया गया, जो उन्होंने कभी दिए ही नहीं, जिससे आम लोगों के बीच गलत संदेश पहुंचा।
जांच में यह भी सामने आया है कि डीजी-आईएसपीआर से जुड़े तंत्र ने पारंपरिक जनसंपर्क से आगे बढ़कर अत्याधुनिक डिजिटल प्रोपेगेंडा नेटवर्क तैयार किया है। इस नेटवर्क में कई डिजिटल ऑपरेटिव शामिल हैं, जो संगठित तरीके से भारत विरोधी सामग्री तैयार कर उसे सोशल मीडिया पर वायरल करते हैं।
खुफिया एजेंसियों के अनुसार “बद्री 313 साइबर फोर्स” नाम का एक नेटवर्क भी सक्रिय है, जो न केवल भारत के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाता है, बल्कि पाकिस्तान के भीतर आलोचनात्मक आवाजों को दबाने का भी काम करता है। यह नेटवर्क बॉट्स और फेक अकाउंट्स के जरिए पोस्ट्स पर कृत्रिम ट्रैफिक बढ़ाकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म को प्रभावित करता है, जिससे कई अकाउंट्स अपने आप ब्लॉक या प्रतिबंधित हो जाते हैं।
सूत्रों ने बताया कि इस तरह की गतिविधियों के कारण कई यूट्यूब वीडियो, वेबसाइट्स, इंस्टाग्राम हैंडल, एक्स (पूर्व ट्विटर) थ्रेड्स और फेसबुक पोस्ट स्वतः रिपोर्ट होकर ब्लॉक हो गए। इससे यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सुनियोजित तरीके से दखल देने की कोशिश की जा रही है।
एक मामले में भारतीय सेना प्रमुख को लेकर फर्जी वीडियो वायरल किया गया, जिसमें उन्हें ईरान से जुड़ी संवेदनशील जानकारी इस्राइल को देने की बात कहते दिखाया गया। हालांकि पीआईबी फैक्ट चेक यूनिट ने इसे पूरी तरह फर्जी करार देते हुए खंडन किया, लेकिन तब तक यह वीडियो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल चुका था।
विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह की साजिश तीन चरणों में काम करती है—पहले चरण में सार्वजनिक भाषणों और वीडियो क्लिप्स को इकट्ठा किया जाता है, दूसरे चरण में डीपफेक और वॉइस क्लोनिंग के जरिए उन्हें एडिट कर नया रूप दिया जाता है, और तीसरे चरण में फेक अकाउंट्स के जरिए बड़े पैमाने पर उसे वायरल किया जाता है।
इस खुलासे के बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं और लोगों से अपील की जा रही है कि वे सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे किसी भी वीडियो या सूचना पर भरोसा करने से पहले उसकी सत्यता जरूर जांच लें।
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