वाराणसी में मसाने की होली: शिवत्व और अद्वैत का महाउत्सव
वाराणसी (आरएनआई) आस्था और अध्यात्म की राजधानी वाराणसी में सदियों पुरानी मसाने की होली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के अद्वैत दर्शन का सजीव उत्सव है। महादेव की इस नगरी में जब चिताभस्म की छाया में रंग और गुलाल उड़ते हैं, तब शिवत्व की अनुभूति अपने चरम पर पहुँच जाती है। यह अनूठी परंपरा काशी की उस आध्यात्मिक चेतना को प्रकट करती है, जहाँ मृत्यु भी उत्सव का स्वरूप धारण कर लेती है।
महाश्मशान की पवित्र भूमि, विशेष रूप से हरिश्चंद्र घाट पर नागा साधु, अघोर साधक, किन्नर समुदाय और सामान्य श्रद्धालु एक साथ एकत्रित होकर उस दिव्य समागम का हिस्सा बनते हैं, जहाँ गृहस्थ और विरक्त के बीच का भेद समाप्त हो जाता है। हर-हर महादेव के जयघोष, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज और भस्म-रंग से सजी यह होली शिव की नगरी में अद्वितीय आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है।
हरिश्चंद्र घाट स्थित महाश्मशान पीठाधीश्वर चंडेश्वर उर्फ कपाली बाबा ने पत्रकार वार्ता में बताया कि पारंपरिक साक्ष्यों के अनुसार इस आयोजन को लगभग 350 वर्ष पूर्व संगठित स्वरूप प्रदान किया गया था। उस समय काल भैरव मंदिर के तत्कालीन पीठाधिपति अघोरी उमानाथ, बाबा कीनाराम के प्रधान शिष्य बाबा बीजाराम तथा नाथ परंपरा के विख्यात संत योगी दीनानाथ के संयोजन में शैव संन्यासी परंपरा के साथ इस उत्सव की विधिवत शुरुआत की गई थी।
कपाली बाबा ने यह भी कहा कि विगत वर्षों में इस पवित्र आयोजन में कुछ अवांछित प्रवृत्तियों के प्रवेश की शिकायतें सामने आई थीं, किंतु संत समाज और स्थानीय प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से आवश्यक सुधार किए गए हैं, जिससे आयोजन की गरिमा और पवित्रता पुनः स्थापित हो सकी है।
काशी को भगवान शिव का अविमुक्त क्षेत्र माना जाता है, जहाँ मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार समझा जाता है। मसाने की होली इसी दर्शन को साकार करती है और यह संदेश देती है कि जब स्वयं महादेव महाकाल हैं, तब मृत्यु भय का विषय नहीं, बल्कि परम आनंद की अनुभूति है। इस अलौकिक परंपरा के माध्यम से वाराणसी आज भी भारतीय अध्यात्म की चरम अभिव्यक्ति के रूप में विश्व पटल पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
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