वायुसेना की मदद से पूर्वोत्तर में टला बड़ा संकट: 1.39 लाख लीटर पानी से बुझी भीषण आग, द्जूकू वैली में ऑपरेशन जारी
नई दिल्ली (आरएनआई)। पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम इलाकों में भड़की भीषण जंगल की आग पर काबू पाने में भारतीय वायुसेना ने निर्णायक भूमिका निभाई है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और चुनौतीपूर्ण उड़ान हालात के बीच चलाए गए हवाई अभियानों के जरिए अरुणाचल प्रदेश के वालांग क्षेत्र में आग को पूरी तरह बुझा दिया गया है, जबकि द्जूकू वैली में आग पर काबू पाने के प्रयास अब भी जारी हैं।
अधिकारियों के अनुसार, वालांग क्षेत्र में वायुसेना के हेलीकॉप्टरों ने कुल 1,39,800 लीटर पानी गिराकर जंगल में फैली आग को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया। यह अभियान बेहद जोखिमभरे हालात में अंजाम दिया गया, जहां खड़ी पहाड़ियां, सीमित दृश्यता और ऊंचाई पर विरल हवा ने पायलटों और तकनीकी दलों के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी कीं। इसके बावजूद सटीक योजना और लगातार उड़ानों के दम पर आग को फैलने से रोक लिया गया, जिससे एक बड़े पर्यावरणीय और मानवीय संकट को टलने में मदद मिली।
वहीं नागालैंड की द्जूकू वैली में राहत और अग्निशमन अभियान अब भी जारी है। यहां Mi-17 V5 हेलीकॉप्टरों को तैनात किया गया है, जो दीमापुर के पास स्थित पदुमपोखरी झील से पानी भरकर जापफू पीक के आसपास लगी आग पर लगातार पानी गिरा रहे हैं। दुर्गम पहाड़ी ढलानों और मौसम की अनिश्चितता के कारण यह ऑपरेशन अभी भी अत्यंत चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
इसी बीच, एयर वाइस मार्शल अजय कुन्नाथ ने ऐसे अभियानों के अनुभवों के आधार पर वायुसेना में तकनीक के उपयोग को लेकर अहम बातें कही हैं। एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान उन्होंने बताया कि भारतीय वायुसेना अब पारंपरिक, स्थिर प्रणालियों से आगे बढ़ते हुए एआई-आधारित मॉडलों की दिशा में काम कर रही है। उनके अनुसार, मौजूदा निर्धारक ढांचे से संभाव्य मॉडल की ओर बढ़ना जरूरी है, ताकि जटिल और ‘जीरो-एरर’ माहौल में भी निर्णय लेने की क्षमता और भरोसेमंदी बढ़ाई जा सके।
उन्होंने स्पष्ट किया कि लक्ष्य ऑटोमेशन से आगे बढ़कर ऑटोनॉमी हासिल करना है, जहां मानव की भूमिका चरणबद्ध तरीके से बदलती है—पहले निर्णयकर्ता के रूप में, फिर निगरानीकर्ता के रूप में और अंततः पूर्ण स्वायत्त प्रणालियों के साथ। हालांकि, उन्होंने यह भी चेताया कि एआई समाधान हर क्षेत्र में समान रूप से लागू नहीं किए जा सकते, क्योंकि हर डोमेन की अपनी जटिलताएं होती हैं। साथ ही, 95 प्रतिशत तक सटीकता देने वाले प्रोबैबिलिस्टिक मॉडल में बचा हुआ पांच प्रतिशत अंतर ही सबसे बड़ा जोखिम बन सकता है, जिसे पाटने के लिए बेहतर डेटा और अधिक उन्नत मॉडलों की जरूरत होगी।
कुल मिलाकर, वायुसेना के त्वरित और साहसिक हवाई अभियानों ने पूर्वोत्तर में एक बड़े संकट को टालने में अहम भूमिका निभाई है, वहीं भविष्य के लिए तकनीक और एआई के बेहतर इस्तेमाल की दिशा भी स्पष्ट की है।
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