पंचायत चुनाव उम्मीदवारों को भी लंबित मामलों की जानकारी देना जरूरी, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने भी उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन ये भी कहा कि जिस मामले को छिपाने का आरोप है, उसमें बसंत लाल को बरी किया जा चुका है। ऐसे में छह साल का प्रतिबंध सख्त है। 

Saturday, April 26, 2025 - 15:10
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पंचायत चुनाव उम्मीदवारों को भी लंबित मामलों की जानकारी देना जरूरी, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

नई दिल्ली (आरएनआई) सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के एक आदेश को बरकरार रखते हुए कहा है कि पंचायत चुनाव के उम्मीदवारों को भी अपने नामांकन पत्र में अपने खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी देना जरूरी है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए एक ग्राम प्रधान के निर्वाचन को रद्द कर दिया। मामला मंडी जिले के पंगना ग्राम पंचायत का है। 

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अपने फैसले में कहा कि 'उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को हम योग्य नहीं पाते हैं, क्योंकि राज्य चुनाव आयोग द्वारा बनाए गए नियमों को उच्च न्यायालय ने अधीनस्थ कानून का हिस्सा माना है। कानून के तहत पंचायत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को भी इसके प्रावधानों का पालन करना जरूरी है।' इससे पहले 16 अक्तूबर 2024 को उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि 'तथ्यों को छिपाना हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1994 के प्रावधानों का उल्लंघन है। यह चुनाव को अमान्य घोषित करने का वैध आधार हो सकता है।' 

उच्च न्यायालय ने प्रधान बसंत लाल के निर्वाचन को रद्द करने का आदेश दिया था। इतना ही नहीं उच्च न्यायालय ने लंबित मामले को छिपाने के आरोप में बसंत लाल को छह साल तक चुनाव लड़ने से भी प्रतिबंधित कर दिया। इस आदेश के खिलाफ बसंत लाल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन ये भी कहा कि जिस मामले को छिपाने का आरोप है, उसमें बसंत लाल को बरी किया जा चुका है। ऐसे में छह साल का प्रतिबंध सख्त है। 

बसंत लाल 17 जनवरी 2021 को प्रधान निर्वाचित हुए थे, लेकिन तीसरे नंबर पर रहे जितेंद्र महाजन ने बसंत लाल के निर्वाचन के खिलाफ सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के सामने याचिका दायर कर नामांकन पत्र में लंबित मामलों की जानकारी छिपाने का आरोप लगाया। आरोप साबित होने पर सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट ने निर्वाचन रद्द कर दिया। इसके खिलाफ बसंत लाल ने उच्च न्यायालय में अपील की, लेकिन वहां से भी निराशा हाथ लगी। 

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