एशियाई विरोधी बयान पर अमेरिका में घमासान, भारतीय और चीनी समुदाय पर टिप्पणी को लेकर ट्रंप घिरे
अमेरिका में राष्ट्रपति Donald Trump के एशियाई समुदाय को लेकर दिए गए विवादित बयान पर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट सांसदों ने ट्रंप के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पेश करते हुए उन पर नस्लवादी भाषा को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। इस मुद्दे पर भारतीय और चीनी मूल के समुदायों में भी नाराजगी देखी जा रही है।
वॉशिंगटन में डेमोक्रेट सांसद Raja Krishnamoorthi, Ted Lieu और Pramila Jayapal ने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में प्रस्ताव पेश कर ट्रंप के बयान की कड़ी आलोचना की। प्रस्ताव में कहा गया कि ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर एक ऐसा पोस्ट साझा किया, जिसमें भारतीय और चीनी मूल के लोगों के खिलाफ अपमानजनक और नस्लवादी भाषा का इस्तेमाल किया गया था।
दरअसल, ट्रंप ने रेडियो होस्ट Michael Savage के शो के एक हिस्से को साझा किया था। इस दौरान जन्म से नागरिकता (बर्थराइट सिटिजनशिप) पर चर्चा करते हुए भारत और चीन से आने वाले लोगों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं। बयान में कहा गया था कि अमेरिका में जन्म लेने वाला बच्चा स्वतः नागरिक बन जाता है और बाद में अपने पूरे परिवार को भारत या चीन जैसे देशों से अमेरिका बुला लेता है।
भारत ने भी इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। भारतीय पक्ष ने टिप्पणी को “अज्ञानता से भरा, अनुचित और खराब स्वाद वाला” बताया। इस विवाद ने अमेरिका में प्रवासियों और एशियाई मूल के नागरिकों को लेकर चल रही बहस को फिर से तेज कर दिया है।
डेमोक्रेट सांसदों ने प्रस्ताव में कहा कि विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए प्रवासी अमेरिका की ताकत हैं और उन्होंने देश के विकास में अहम योगदान दिया है। सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने कहा कि जब देश का राष्ट्रपति खुद इस तरह की भाषा को बढ़ावा देता है, तो यह बेहद खतरनाक संदेश देता है, खासकर ऐसे समय में जब एशियाई समुदाय पहले से ही भेदभाव और हिंसा का सामना कर रहा है।
टेड लियू ने कहा कि अमेरिका के इतिहास में एशियाई मूल के लोगों को अक्सर बाहरी समझा गया, चाहे वे कितने भी समय से वहां रह रहे हों। वहीं प्रमिला जयपाल ने ट्रंप के बयान को “घृणा फैलाने वाला” बताते हुए कहा कि इस तरह की टिप्पणियां समाज में पहले से मौजूद नफरत को और बढ़ा सकती हैं।
इस पूरे विवाद ने अमेरिका में नस्लवाद, प्रवासियों के अधिकार और राजनीतिक भाषा की मर्यादा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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