आम पत्रकार और 'गोदी पत्रकार' में फर्क समझना होगा, बिना तथ्यों के चरित्र हनन लोकतंत्र के लिए घातक
नई दिल्ली। पत्रकारिता को लेकर बढ़ती कटुता और सभी पत्रकारों को एक ही नजरिए से देखने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए एक वरिष्ठ फील्ड पत्रकार ने कहा है कि अब समय आ गया है जब आम पत्रकार और तथाकथित "गोदी पत्रकार" के बीच अंतर को समझा जाए। उनका कहना है कि किसी बड़े मीडिया हाउस या मेनस्ट्रीम मीडिया में कार्यरत हर पत्रकार को सत्ता समर्थक या पक्षपाती मान लेना न केवल गलत है, बल्कि उन पत्रकारों के साथ भी अन्याय है जो कठिन परिस्थितियों में निष्पक्ष पत्रकारिता करने का प्रयास करते हैं।
उन्होंने कहा कि रोजी-रोटी के लिए बड़े मीडिया संस्थानों में काम करना किसी पत्रकार के चरित्र या पेशेवर ईमानदारी का प्रमाण नहीं हो सकता। कई पत्रकार ऐसे हैं जो संस्थान की सीमाओं के बावजूद अपना जमीर नहीं बेचते और जनहित के मुद्दों को सामने लाने का प्रयास करते हैं। ऐसे पत्रकारों के योगदान को भी समाज द्वारा समझे जाने की आवश्यकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जिस प्रकार किसी भी बहुराष्ट्रीय कंपनी या बड़े संस्थान के सभी कर्मचारियों का व्यवहार, कार्यशैली और नैतिकता एक जैसी नहीं होती, उसी प्रकार मीडिया संस्थानों में कार्यरत सभी पत्रकारों को भी एक ही नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। बिना किसी तथ्य या शोध के किसी पत्रकार को गालियां देना, उसे अपमानित करना या उसका चरित्र हनन करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि फील्ड रिपोर्टिंग अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। एक पत्रकार रोजाना अनेक जोखिमों और कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए ग्राउंड जीरो से खबरें लोगों तक पहुंचाता है। इसके बावजूद यदि समाज उसे सम्मान देने के बजाय अभद्रता का सामना कराता है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
उन्होंने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार या दलाली किसी एक पेशे तक सीमित नहीं है। डॉक्टर, वकील, न्यायाधीश, पुलिसकर्मी, धार्मिक गुरु या अन्य किसी भी क्षेत्र के व्यक्ति में गलत आचरण की संभावना हो सकती है। ऐसे में केवल पत्रकारों को निशाना बनाना उचित नहीं है। किसी भी पत्रकार पर आरोप लगाने से पहले उसके काम, निष्पक्षता और कार्यशैली का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर बिना कारण लगातार अविश्वास और हमले होते रहे, तो भविष्य में जनता की आवाज उठाने वाले स्वतंत्र पत्रकारों की संख्या कम होती जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यूट्यूबर और पेशेवर पत्रकार के कार्यक्षेत्र एवं जिम्मेदारियों में मूलभूत अंतर होता है। हालांकि हाल के वर्षों में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कई अच्छे पत्रकार उभरे हैं, लेकिन इसके आधार पर पूरे मेनस्ट्रीम मीडिया को खारिज करना उचित नहीं है।
उन्होंने देशभर के पत्रकार संगठनों से भी अपील की कि वे पत्रकारों की सुरक्षा, गरिमा और पेशेवर एकजुटता के लिए सक्रिय भूमिका निभाएं। उनका कहना था कि यदि फील्ड में पत्रकार स्वयं सुरक्षित नहीं होगा, तो वह ग्राउंड जीरो से निष्पक्ष और प्रभावी रिपोर्टिंग कैसे कर पाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि पत्रकारों के बीच आपसी एकता की कमी लंबे समय से महसूस की जाती रही है। कई बार निजी हितों या अन्य लाभ के लिए पत्रकार एकजुट दिखाई देते हैं, लेकिन जब किसी साथी पत्रकार के अधिकारों या सुरक्षा की बात आती है तो अधिकांश लोग पीछे हट जाते हैं। उन्होंने पत्रकार समुदाय से आग्रह किया कि व्यक्तिगत और संस्थागत मतभेदों से ऊपर उठकर सत्य और जनहित की रक्षा के लिए एक मंच पर आने की आवश्यकता है।
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