प्रेस कॉम्प्लेक्स की बदलती तस्वीर, पत्रकारिता का खोता केंद्र
प्रेस को लेकर सकारात्मक सोच रखने का दौर अस्सी के दशक में देखा था और उसी वक्त राजनीतिक इच्छा शक्ति और दूरदृष्टि रखने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने अखबारों के साथ उन लोगों की चिंता की जो शाम ढ़लते ही राजधानी में कोने कोने में प्रेस विज्ञप्तियां लगाने के लिए चक्कर लगाते थे। अखबारों के दफ्तरों के बीच फासला इतना हुआ करता था कि कई दफा विज्ञप्ति समय पर पहुंच ही नहीं पाती थी। तब मोबाइल नहीं थे टेलीफोन हुआ करते थे वह भी बड़े लोगों के पास, टेलीफोन बूथ पर मिनटों का किराया लगता था, वाहनों की सुविधा भी इतनी नहीं थी। और तो और एक साथ सभी अखबारों को एक ही समय सूचना न मिल पाती थी और न ही दे पाना संभव था। लेकिन पत्रकारिता का स्वर्णिम युग का दौर था अखबारों और पत्रकारों के साथ उससे जुड़े तमाम पहलुओं पर बड़ी गंभीरता के साथ अर्जुन सिंह ने विचार किया, चूंकि इस दौर में पत्रकार मंत्रियों के बंगलों पर जाते नहीं थे बल्कि मंत्री रात के समय अखबारों के दफ्तरों में स्वयं अपनी बात रखने जाते थे, इसलिए समस्या उनके सामने भी थी, सो प्रेस काम्प्लेक्स का आधारशिला रखी गई और नाम रखा गया इंदिरा प्रेस काम्प्लेक्स। तब बड़े ही नहीं बल्कि छोटे और मझोले अखबारों को बुला बुलाकर प्रेस काम्प्लेक्स में उनकी आवश्यकतानुसार जमीन आवंटित की गई। ऐसा भोपाल में ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश के अन्य शहरों में भी किया गया। इस नवाचार से अखबारों को नई दिशा और ऊर्जा मिली और संवाद, संचार को गति मिली। उस समय प्रेस काम्प्लेक्स का पूरा क्षेत्र बड़ी बड़ी झाडिय़ों से भरा था वक्त के साथ यह स्थान गुलजार होने लगा और वह वक्त भी आया जब पूरा शहर नींद में होता तो यह पूरा इलाका जागता था। इसकी रौनक और माहौल को देख छोटे,बड़े और मझोले अखबार ही नहीं बल्कि कई पत्रिकाओं के छोटे बड़े दफ्तर यहां खुल गए। कुछ ने तो अखबार का पंजीयन कराया और जमीन आवंटित करा ली, कई जमीनें तो आज तक खाली पड़ी हैं, कुछ दफ्तर खंडहर हो गए। दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि अर्जुन सिंह के बाद किसी भी मुख्यमंत्री या सत्ताधारी दल ने प्रेस काम्प्लेक्स की जरूरतों को नहीं समझा। एक बार प्रयास हुए कि जो अखबार जमीन नहीं खरीद सकते उनके लिए यहां सरकार एक बड़ा सुविधायुक्त बिल्डिंग तैयार कर सबको एक ही छत के नीचे ले आया जाए लेकिन सत्तासीनों की इच्छाशक्ति नींद में डूबी रही और समय समय पर या कहें राजनीतिक पकड़ और दमदारी पर अखबारों के ब्यूरो के लिए आवास आवंटित कर दिए गए। आज प्रेस काम्प्लेक्स वैसा नहीं जैसा शायद अर्जुन सिंह ने सोचा था वर्तमान में तो पूरा काम्प्लेक्स व्यवसायिक गतिविधियों का अड्डा बन गया है। यहां जिन अखबारों को जमीन आवंटित की गई थी उन्होंने अखबार का दफ्तर एक कमरे में समेट लिया है और बिल्डिंग बनाकर बाजार बना दिया है। भले ही आज अखबार की तुलना में किराए में वह अधिक कमा रहे हैं लेकिन वास्तव में जो प्रिंट, इलेक्ट्रानिक या फिर डिजिटल प्लेटफार्म पर काम कर रहे हैं वह शहर के कई हिस्सों में अपना दफ्तर खोले हुए हैं लेकिन उन्हें वह पहचान नहीं मिल पा रही। कहते हैं कि जगह का असर होता है। प्रेस काम्प्लेक्स का पता किसी भी मीडिया हाउस के लिए सम्मान और ख्याति में अहम रोल निभाती है।
वर्तमान सत्ता को मंथन इस विषय पर करना चाहिए क्योंकि इस दौर में छोटे मीडिया प्लेटफार्म को चलाना वह भी किराए के मकानों में बेहद मुश्किल है इसलिए पहले प्रेस काम्प्लेक्स में एक बिल्डिंग तैयार की जाए या फिर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय का भवन को मीडिया संस्थानों को किराए पर उपलब्ध कराया जाए क्योंकि यह विश्वविद्यालय अपने परिसर में स्थापित हो चुका है। चूंकि भवन विवि की निजी प्रापर्टी है लेकिन सरकार की इच्छाशक्ति हो तो संभव हो सकता है। दूसरा प्रेस काम्प्लेक्स में व्यवसायिक गतिविधियों पर अंकुश लगाया जाए जिससे कि इसके निर्माण का ध्येय पूरा हो सके।
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