गुना में बाढ़ से पहले फिर उठे सवाल, एक साल बाद भी नहीं बदले हालात
पहले एक कहानी सुनिये। जंगल में एक बार प्रयोग हुआ कि राजा बदला जाए। शेर ही हर बार राजा नहीं बनेगा। जंगल में सभा हुई और शेर के बजाए बंदर को राजा चुन लिया गया। अगले ही दिन एक खरगोश को लोमड़ी उठा ले गई। सारे खरगोश नए राजा के पास पहुंचे कि हुकुम रक्षा करो, लोमड़ी हमारे साथी को उठा ले गई, उसे बचा लो, हमारी सहायता करो राजन्।
ये सुनकर राजा (बंदर) ने जोर की धुड़की मारी और वह सभी खरगोशों को यह आश्वासन देकर कि मैं अभी साथी खरगोश को वापस लाता हूँ, उस दिशा की ओर पेड़ों पर छलांग लगाते हुए चला गया जिस ओर लोमड़ी खरगोश को उठाकर ले गई थी। तीन दिन बीत गए राजा वापस अपने ठिकाने पर नहीं लौटा तो सारे खरगोश उसे ढूंढने निकले।
एक जगह उन्होंने देखा कि राजा एक पेड़ पर इस डाली से उस डाली पर, उस डाली से इस डाली पर छलांगे मार-मार कर पसीना-पसीना हो रहा था। सारे खरगोशों ने राजा से पूछा ये क्या कर रहे हो राजन्, हमारे साथी खरगोश का कुछ पता चला? राजा बंदर बोला, देख नहीं रहे, उसी को ढूंढने के लिए तो तीन से लगातार इतनी मेहनत कर रहा हूं, पसीना पसीना हो गया हूं।
जंगल वाली कहानी खत्म।
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अब बात अपने #गुना_शहर "हमरो गुना" की। आपको 05 जून 2025 और 29 जुलाई 2025 ये दो तारीखें याद होंगी। ये दोनों तारीखें गुना शहर के इतिहास में बाढ़ के लिए जानी जाएंगी। 29 जुलाई की बाढ़ ने शहर को तबाही का मंज़र दिखाया था। कई परिवारों की गृहस्थी उजाड़ी थी। चार पांच लोग बहने से मर गए थे। जनता आक्रोशित हुई थी। परिणामस्वरूप पुतला दहन हुए। चक्काजाम किए गए।
जनता के गुस्से को देखते हुए सरकार और प्रशासन ने हालात सुधारने के वादे किए। कहा कि बाढ़ न आए इसके पर्याप्त प्रबंध किए जाएंगे। नालों से अतिक्रमण हर हाल में हटाए जाएंगे। सौन्दर्यीकरण किया जाएगा। मुझे लगा कि अब उद्धार होगा। चार पांच #बलि चढ़ चुकीं हैं इसकी कीमत समझी जाएगी। करोड़ों रुपए के नुकसान को देखकर कर्णधार अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे।
क्या ऐसा हुआ? पूरा एक साल गुजर गया। गुनिया के नाम पर कई समितियां बनीं। जन सहयोग के लिए कई बैठकें होती रहीं। जनता को दिखाने के लिए शुरुआत में कुछ जगह अवैध पुलिया और बाउंड्रीवाल तोड़ी गई। चंदा इकट्ठा हुआ। लेकिन साल भर में एक भी ठोस काम नहीं हुआ। साल भर एक #जेसीबी मिट्टी और गाद को नाले में से उठाकर नाले में ही इधर उधर पटकती रही। बड़े बड़े वादे, बड़े बड़े इरादे फुस्स हो गए।
पूरे साल गुनिया इवेंट चलता रहा। प्रशासन उन #12पीएम_आवास तक को नहीं हटवा सका जो प्रशासन ने ही अवैध रूप से नाले के अतिक्रमण क्षेत्र में बनवा दिए थे। ये आवास तब भी नहीं हटवा सका जब उन्हें हटाने के बाद दूसरे आवास देने के लिए कॉलोनाइजरों से पर्याप्त पैसे इकट्ठे किए जा चुके हैं।
हां, इस दौरान एक काम बड़े इत्मीनान से चलता रहा। वह काम था नाले के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण कर #पाथवे बनाने का काम। प्रशासन ने शासकीय धन खर्च कर पुरानी गल्ला मंडी के शास्त्री पुल से हाटरोड के रपटा तक एन नाले में मिट्टी का भराव कर एक पाथ-वे बनवा डाला।
सबको पता है कि इस क्षेत्र में दोनों तरफ अतिक्रमण होने से यहां भी बाढ़ आती है, जिससे निचला बाजार प्रभावित होता है लेकिन फिर भी पाथवे बनाया गया अब पहले से संकरा नाला इस जगह और तंग हो गया है।
पाथ वे निर्माण से पूर्व एरिगेशन डिपार्टमेंट और NGT से इसकी परमिशन ली गई या नहीं पता नहीं! हो सकता है तकनीकी जानकार यहां अभिनव प्रयोग कर रहे हों उनकी बाढ़ के पानी से बात हो गई हो, गुनिया देवी को उन्होंने मना लिया हो कि "हे देवी इस जगह पर आप उफनना मत, आप पाथवे से पैदल चलकर चुपचाप आगे निकल जाना।"
हैरानी इस बात की है कि 2015-16 में इसी हिस्से में हाईफ्लड लेबल (बाढ़ के उच्च स्तर) से काफी ऊंचाई पर सिंगल कॉलम ओवरहेड स्लैब डालकर नीचे नाला और ऊपर एलिवेटेड रोड और पार्किंग बनाने की योजना पर कागजों में काम शुरू हुआ था। तब अचानक गुनिया के कई मानस पुत्र पैदा हो गए थे। जिन्होंने गुनिया की आरती उतारकर, गुनिया को राखी बांधकर और गुनिया को बचाने का भ्रम फैलाकर नौटंकी और प्रोपेगंडा किए थे। जिसका असल मकसद एक शानदार प्रोजेक्ट का विरोध करना था।
ऐसे #गुणी_गुनियापुत्रों को गुनिया की छाती पर बना ये पाथवे नजर क्यों नहीं आया? उनका क्या मीठा था इसमें? उन्होंने इसका विरोध क्यों नहीं किया? विशेषज्ञ बनकर घूमने वाले गुनिया पुत्र ही इन सवालों का जबाव दे पाएंगे।
प्रशासन की ओर से एन बारिश के पहले #नमामि_गंगे योजना में गुनिया के उद्धार का प्रोजेक्ट बनाकर भेजा गया है। प्रोजेक्ट को लेकर एक टीम ने सर्वे किया है। सर्वे के दौरान टीम के एक्सपर्ट ने जो संकेत दिए वो मीडिया में छप चुके। ऐसे में प्रोजेक्ट कब पास होगा पता नहीं। पास होगा भी या नहीं कह नहीं सकते।
इस एक साल में इतना जरूर हुआ है कि प्रशासन और सरकार ने बाढ़ पीड़ित लोगों के गुस्से पर काबू पा लिया। जब गुस्सा ज्यादा था तब कई मशीनें लगाकर शुरुआत में अतिक्रमण तोड़े जा रहे थे। धीरे धीरे गुस्सा कम होता गया तो मशीनें घटती गईं। आखिरी में एक जेसीबी ही नाले की मिट्टी में सूंड हिलाकर जनता का मनोरंजन और विवाद की स्थिति निर्मित करती देखी गई।
"*इस एक साल के दौरान हाई फ्लड लेबल 30 मीटर के जो #लाल_निशान प्रशासन ने लगवाए थे वो सभी अतिक्रमण टूटने के डर से लोगों के द्वारा पोत दिए गए। नदी नालों की सीमाबंदी के लिए फॉरेस्ट वालों के सहयोग से लगाई गई सीमेंट की मुड्डियां भी तोड़ दी गईं।*"
*अतिक्रमणकारियों ने अपने अतिक्रमण और मजबूत कर लिए ताकि बाढ़ के पानी से नुकसान न हो। स्टे का रास्ता बताकर कोर्ट से स्टे दिला दिए गए फिर उन स्टे को बैकेट कराने के कोई प्रयास नहीं हुए।*
विधायक #प्रीतम_लोधी जी की लैंग्वेज में कहूं तो अतिक्रमण किसी के डैडी से भी आसानी से हटने वाला नहीं है और अतिक्रमण हटाकर इंक्रोचमेंट डैडी ब्रिगेड से बुराई लेने की स्थिति में कोई है नहीं।
तो ये पूरी कहानी जिसके और भी कई पहलू हैं। ये समझने के लिए काफी है कि सरकारें कैसे काम करती हैं, और प्रशासन किस तरह से बड़े से बड़े हादसों के बाद जनता के विरोध को शांत करने के लिए जतन करता है। भले ही सकारात्मक परिणाम आए न आए, चीजें ठीक हों या न हों। ये चीजें सीखने लायक हैं।
और इस असल कहानी का शुरुआत में लिखी गई जंगल वाली काल्पनिक कहानी से कोई सीधा संबंध नहीं है।
ईश्वर न करे, कि इस वर्षाकाल में फिर बाढ़ के हालात बनें। गुना की सरकार और प्रशासन के लिए ये राहत की बात है कि मौसम विभाग मानसून को इस साल कमजोर बता रहा है।
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