1857 के स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानायक हुतात्मा राजा हर प्रसाद
रायबरेली (आरएनआई) उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के नसीराबाद गाँव में कन्नौज निवासी राय भीखम राय, कायस्थ, नाजिम, सम्राट अलाउद्दीन खिलज़ी से १२८ गाँव प्राप्त कर आये थेl उन्ही के वंशज मुंशी ब्रजलाल के घर १८वि शताब्दी के अंत में दो यशश्वी बालको का जन्म हुआ जिनका नाम हर प्रसाद और जयंती प्रसाद थाl दोनों बचपन से स्वस्थ, सुन्दर आकर्षक, तीक्ष्ण बुद्धि के मालिक, नेतृत्व की कला में माहिर, अस्त्रों शस्त्रों की कला में निपुण थेl
हर प्रसाद का विवाह १८ वर्ष की आयु में रायबरेली के पहरेमऊ निवासी एवं सीतापुर के खैराबाद के नाजिम, कायस्थ राजा गिरधारा सिंह की पुत्री से संपन्न हुआl वे उनके साथ तत्कालीन अवध के नवाब वाजिद अली शाह के पास गए जिन्होंने उनकी निपुणता से प्रभावित होकर उन्हें राजा की उपाधि दी और खैराबाद का नाजिम नियुक्त कियाl
मात्रभूमि के प्रति प्यार और समर्पण की वजह से वे अल्प अवधि में अवध के नवाब और बेगम हज़रत महल के विश्वसनीय हो गएl अवध के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राजा हर प्रसाद और उनके अनुज राय जयंती प्रसाद जो कि फैजाबाद के नवाब के यहाँ Atourney General थे, का अतुलनीय योगदान रहा हैl दोनों भाइयो ने अपनी मात्रभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया और जरूरत पड़ने पर अपने महल, हवेलिया बेचीं और अवध की सेना को कई बार खड़ा करके अंग्रेजी हुकूमत के पाँव उखाड़ने का निरंतर प्रयास करते रहेl
राजा हर प्रसाद को, जिनकी कर्तव्यपरायणता की वजह से, समय के साथ कई उपाधियो से नवाज़ा गया, सीतापुर गजेटियर में राजा हर प्रसाद को “लास्टविले एण्ड मोस्ट नटोरियस गवर्नर ऑफ़ अवध” लिखा हैl उनकी देशभक्ति और रण कौशल से परेशान होकर खैराबाद डिविजन के कमिश्नर जे. क्लार्थ ने फोरसिस को ख़त में लिखा था “मोहम्मदी जिला और सीतापुर जिले का उत्तरी हिस्सा इस पूरी तरह से विद्रोहियों के हाथ में है कि इन जिलो के निवासियों के साथ सामान्य संवाद जैसी कोई चीज़ संभव नहीं है ...... सेना के अलावा और कोई असर हमारे पक्ष में काम नहीं कर सकता. हर प्रसाद चकलादार के प्रभाव के कारण विद्रोही ब्रिटिश टुकडियो की निकटता के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त है”
अक्टूबर 1858 में राजा हर प्रसाद ने 1200 स्वतंत्रता सेनानियों और १२ बन्दूखो के साथ गोमती पार की और रास्ते में कई अन्य ज़मींदारो को साथ लेते हुए संडीला पर हमला बोल दियाl चार दिन तक संडीला पर उनका कब्ज़ा रहा (फोरसिथ का एड्मिसटन को 9 अक्टूबर 1858 को लिखा ख़त)
लखनऊ पर अंग्रेजो का कब्ज़ा हो जाने के बाद बेगम जब लड़ाई जारी रखने के लिए किसी सुरक्षित स्थान के लिए निकली, तब अंग्रेजो की गिरफ्त से बचने के लिए वे अपने दल बदल के साथ खैराबाद के राजा हर प्रसाद के यहाँ रुकी थीl राजा हर प्रसाद ने बेगम को तोपों की सलामी दिलाई और हज़ारो रुपये उनके सम्मान में गरीबो पर न्योछावर कर दिएl राजा हर प्रसाद के साथ ही बेगम महमूदाबाद गयी जहां राजा नवाब अली खान ने उनका स्वागत कियाl
राजा हर प्रसाद की तत्कालीन नेपाल राजघराने की नजदीकियों की वज़ह से बेगम अपने लाव लश्कर और साथियो के साथ वहाँ कूच कर गयी थीl बेगम के नेपाल प्रस्थान के पश्चात उनकी इक्षा का अनुकरण करते हुए राजा हर प्रसाद अवध के तात्या टोपे बने हुए, अपनी सेना और साथी ताल्लुकेदारो, जमींदारो के साथ अंग्रेजो से निरंतर युद्ध करते रहे और अंततः 31 दिसम्बर 1858 को राजा हर प्रसाद दरियाबाद के किले पर अंग्रेजो के आक्रमण में शहीद हुएl उनकी मृत्यु के पश्चात अंग्रेजी हुकूमत ने रायबरेली, सीतापुर लखनऊ आदि शहरो में उनकी संपत्ति को ज़ब्त कर लिया और सरेबाजार नीलाम कर दिया जिसमे से कुछ का विवरण और निशानियाँ, आज भी उनके वंशज श्री राय ब्रजेश चन्द्र और उनके पुत्रो श्री अभिषेक राय और श्री मनीष राय के पास मौजूद है जो की रायबरेली जिले में सुपरमार्केट के सामने कोठी नसीराबाद में रहते हैl
राजा हर प्रसाद की मौत के बाद अंग्रेजो ने सम्पूर्ण खानदान को ख़त्म करने का आदेश दिया पर अनेक विषम परिस्थितियो को झेलते हुए और बाबू साहब टेकारी की मदद से, राय जयंती प्रसाद ने अपने सम्पूर्ण खानदान को बचाया और अंग्रेजो द्वारा लादे गए सही गलत कर और आरोपों से अंत समय तक लड़ते रहेl
राजा हर प्रसाद व् उनकी पत्नी की समाधि उनके वंशजो ने उनकी जन्मस्थली नसीराबाद में बनवा दी और उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके सम्मान में एक स्मारक खैराबाद में बनवा दियाl
1857 की आजादी की लड़ाई के सेनानायक, राय साहब नसीराबाद परिवार में जन्मे, अवध शासन के अधीन अंदरुन जिला रायबरेली एवं खैराबाद के राजा, हमारे पूर्वज स्व० हर प्रसाद जी के 166वें बलिदान दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि। अवध शासन की अंतिम बेगम हजरत महल को अपने मित्र राज्य नेपाल में सकुशल पहुचवाने के बाद, आज ही के दिन 31 दिसंबर1858 ई० में दरियाबाद के किले में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध रणनीति बनाते समय एक गद्दार की मुखबिरी से हुए हमले में राजा साहब, उनके ससुर राजा पहरेमऊ गिरधारा सिंह जी एवं दरियाबाद के राजा ने अंग्रेजो की सेना से लड़ते हुए अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान, प्राणों को न्यौछावर करके दिया था।
आप सभी हुतात्माओ को ह्रदय तल से श्रद्धांजलि एवं नमन?
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)