पश्चिम एशिया युद्ध की भारी कीमत: UN रिपोर्ट में खुलासा, 2025 की GDP बढ़ोतरी से ज्यादा नुकसान
न्यूयॉर्क (आरएनआई)। पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका गहरा असर क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और समाज पर साफ दिखाई देने लगा है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट ने इस संकट की गंभीरता को उजागर करते हुए बताया है कि युद्ध के चलते इस क्षेत्र को इतना आर्थिक नुकसान हो चुका है, जो वर्ष 2025 में हुई कुल जीडीपी वृद्धि से भी अधिक है।
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया के देशों को उनकी सामूहिक जीडीपी का लगभग 3.7 से 6 प्रतिशत तक नुकसान होने की आशंका है, जो अधिकतम 194 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। जैसे-जैसे यह संघर्ष लंबा खिंच रहा है, वैसे-वैसे आर्थिक क्षति भी बढ़ती जा रही है, जिससे पूरे क्षेत्र की विकास गति पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि युद्ध के कारण रोजगार के अवसरों में भारी गिरावट आ सकती है। अनुमान है कि बेरोजगारी दर में करीब 4 प्रतिशत अंकों की वृद्धि होगी और लगभग 36 लाख नौकरियां समाप्त हो सकती हैं। यह आंकड़ा वर्ष 2025 में सृजित कुल नौकरियों से भी अधिक बताया गया है। इसके साथ ही, लगभग 40 लाख लोगों के गरीबी रेखा से नीचे जाने का खतरा भी मंडरा रहा है, जो सामाजिक असमानता को और गहरा कर सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट ने क्षेत्र की संरचनात्मक कमजोरियों को भी उजागर किया है। इसमें कहा गया है कि अल्पकालिक सैन्य तनाव भी पश्चिम एशिया में लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव छोड़ सकता है। मानव विकास सूचकांक में 0.2 से 0.4 प्रतिशत तक गिरावट आने की आशंका जताई गई है, जो लगभग आधे से एक वर्ष की प्रगति के नुकसान के बराबर है।
यूएनडीपी के अरब क्षेत्रीय ब्यूरो के निदेशक और संयुक्त राष्ट्र के सहायक महासचिव अब्दल्लाह अल दरदारी ने इस स्थिति को गंभीर चेतावनी करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह संकट क्षेत्र के देशों को अपनी आर्थिक और सामाजिक नीतियों पर पुनर्विचार करने का संकेत देता है। उन्होंने क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने, हाइड्रोकार्बन पर निर्भरता कम करने, अर्थव्यवस्थाओं के विविधीकरण और व्यापार-लॉजिस्टिक्स सिस्टम को सुरक्षित बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यदि जल्द ही हालात सामान्य नहीं हुए, तो पश्चिम एशिया को लंबे समय तक आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
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