19 साल पुराने मामले में रिकॉर्ड गुम होने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा— न्याय व्यवस्था की जड़ों पर सीधा प्रहार
नई दिल्ली (आरएनआई)। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात से जुड़े एक 19 वर्ष पुराने आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान केस रिकॉर्ड और मूल दस्तावेजों के गुम हो जाने की घटना पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि जांच से संबंधित महत्वपूर्ण फाइलों और दस्तावेजों का गायब होना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं माना जा सकता, बल्कि यह आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर सीधा आघात है।
मामला *Sahil Abdulsattar Mansuri & Ors. v. Safimahamad Fafirbhai Mansuri & Ors.* से संबंधित है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2007 में दर्ज एक शिकायत से हुई थी। शिकायत में संपत्ति से जुड़े दस्तावेजों में कथित जालसाजी, फर्जी हस्ताक्षर और धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि जांच से जुड़े मूल रिकॉर्ड और महत्वपूर्ण दस्तावेज न्यायालय को भेजे जाने की प्रक्रिया में गुम हो गए थे। इसके परिणामस्वरूप जांच प्रभावित हुई और मामले की कार्यवाही लंबे समय तक ठप पड़ी रही।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि जब जांच से जुड़े मूल दस्तावेज सुरक्षित नहीं रह पाते, तो इससे न केवल साक्ष्यों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है बल्कि न्याय मिलने में भी अनावश्यक देरी होती है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि रिकॉर्ड के गुम होने के कारण मामले की जांच दोबारा शुरू करनी पड़ी, जिससे न्यायिक प्रक्रिया लगभग दो दशकों तक अनिश्चितता में फंसी रही।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय प्रणाली की मजबूती के लिए केस रिकॉर्ड और दस्तावेजों का सुरक्षित संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। अदालत की यह टिप्पणी उन सभी एजेंसियों और संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण संदेश मानी जा रही है जो आपराधिक मामलों की जांच और रिकॉर्ड प्रबंधन से जुड़े हैं।
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