एमपी में 'एंबुलेंस' नहीं, 'भ्रष्टाचार' दौड़ रहा है: 1500 करोड़ का महाघोटाला, मुर्दों के नाम पर भी कटी रसीदें!

Tuesday, April 14, 2026 - 14:39
Updated: 4 months ago
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एमपी में 'एंबुलेंस' नहीं, 'भ्रष्टाचार' दौड़ रहा है: 1500 करोड़ का महाघोटाला, मुर्दों के नाम पर भी कटी रसीदें!

भोपाल (आरएनआई) मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में एक ऐसा 'इलाज' चल रहा है जिससे मरीज तो नहीं, लेकिन भ्रष्टाचार का सिंडिकेट जरूर सेहतमंद हो रहा है। मामला प्रदेश में संचालित 2061 एंबुलेंस से जुड़ा है, जिसमें अब तक 1500 करोड़ रुपये से ज्यादा के भुगतान और भारी धांधली के आरोप लगे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता पुनीत टंडन ने इस पूरे मामले की पुख्ता दस्तावेजों और शपथ पत्र के साथ लोकायुक्त में शिकायत दर्ज कराई है।

भ्रष्टाचार के 5 बड़े 'पॉइंट्स' जो आपको चौंका देंगे:

1. कागजों पर दौड़ रही एंबुलेंस (GPS घोटाला):

आरटीआई से निकले दस्तावेजों के मुताबिक, विदिशा जैसे जिलों में एक-एक एंबुलेंस एक दिन में 500 से 600 किलोमीटर चल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि एक शहर या जिले के भीतर एक एंबुलेंस का रोजाना इतना चलना व्यावहारिक रूप से असंभव है। यह सीधे तौर पर फर्जी बिलिंग का मामला है।

2. बिना मरीज के ही 'सायरन' बज रहा:

शहडोल और डिंडोरी जैसे जिलों से मिली जानकारी के अनुसार, एंबुलेंस के रिकॉर्ड में मरीजों के नाम, कॉलर आईडी और कॉल करने वाले का पता ही गायब है। गाड़ी कहां गई, किसे छोड़कर आई, इसका कोई अता-पता नहीं है, लेकिन भुगतान पूरा लिया गया।

3. एमपी का पैसा, छत्तीसगढ़ का टैक्स:

एंबुलेंस का संचालन करने वाली कंपनी 'जय अंबे इमरजेंसी सर्विसेज' मूल रूप से छत्तीसगढ़ की है। नियम के मुताबिक, मध्य प्रदेश में सेवा देने वाली गाड़ियां यहीं रजिस्टर्ड होनी चाहिए ताकि टैक्स राज्य को मिले। लेकिन ये गाड़ियां छत्तीसगढ़ में रजिस्टर्ड हैं, जिससे मध्य प्रदेश के परिवहन विभाग को करोड़ों के राजस्व का चूना लग रहा है।

4. राजस्थान की ब्लैकलिस्टेड कंपनी को काम:

हैरानी की बात यह है कि जिस कंपनी को मध्य प्रदेश की जनता की जान बचाने का जिम्मा दिया गया, वह राजस्थान में पहले ही ब्लैकलिस्ट में डाली जा चुकी है।

5. श्रम कानूनों की धज्जियां:

इस घोटाले में सिर्फ पैसा ही नहीं, इंसानों का भी शोषण हो रहा है। कंपनी में काम करने वाले करीब 6000 से 8000 कर्मचारियों का श्रम विभाग में कोई रिकॉर्ड ही नहीं है, जिससे उन्हें कोई कानूनी सुरक्षा या लाभ नहीं मिल पा रहा।

डिप्टी सीएम ने मानी 'गलती', पर कार्रवाई कब?

विधानसभा में जब नेता प्रतिपक्ष और विधायकों ने इस मुद्दे को उठाया, तो प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि "गलती हुई है।" सवाल यह उठता है कि जब सरकार खुद सदन में गलती मान रही है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और कंपनी पर अब तक एक्शन क्यों नहीं हुआ? "जब एंबुलेंस तब पहुंचती है जब मरीज मर चुका होता है, और बिलिंग फर्जी मरीजों के नाम पर होती है, तो यह लापरवाही नहीं, सीधा-सीधा भ्रष्टाचार है।

आगे क्या?

लोकायुक्त में शिकायत दर्ज होने के बाद अब गेंद जांच एजेंसियों के पाले में है। यदि एक-दो महीने में ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो मामला हाई कोर्ट तक ले जाने की तैयारी है। जनता के टैक्स के 1500 करोड़ रुपये का यह 'एंबुलेंस घोटाला' आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़ा भूचाल ला सकता है।

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