ईरानी हमलों का खौफ: अमेरिकी सैनिकों ने छोड़े सैन्य ठिकाने, होटलों और सुरक्षित ठिकानों में शरण
तेहरान (आरएनआई)। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच Iran के हमलों ने United States की सैन्य रणनीति को बड़ा झटका दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कई अमेरिकी सैनिकों को अपने सैन्य ठिकाने छोड़कर अस्थायी सुरक्षित स्थानों, जैसे होटलों और दफ्तरों में शरण लेनी पड़ रही है। लगातार हमलों के खतरे के चलते सैनिकों में भय का माहौल बना हुआ है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, जमीनी स्तर पर तैनात बड़ी संख्या में सैनिक अब दूरस्थ स्थानों से ही ऑपरेशन चला रहे हैं। हालांकि लड़ाकू पायलट और एयरक्रू अभी भी कुछ सैन्य ठिकानों पर डटे हुए हैं और जवाबी कार्रवाई जारी है। इसी बीच, Islamic Revolutionary Guard Corps (आईआरजीसी) ने आम लोगों से अमेरिकी सैनिकों के ठिकानों की जानकारी साझा करने की अपील की है, जिससे खतरा और बढ़ गया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, युद्ध शुरू होने के समय क्षेत्र में करीब 40 हजार अमेरिकी सैनिक मौजूद थे, लेकिन अब United States Central Command (सेंट्रल कमांड) ने हजारों सैनिकों को अलग-अलग स्थानों पर भेज दिया है। कुछ सैनिकों को यूरोप तक स्थानांतरित किया गया है, जबकि कई अब भी पश्चिम एशिया में हैं, लेकिन अपने मूल ठिकानों से हटाए जा चुके हैं।
ईरान ने Israel और अमेरिका के संयुक्त हमलों का तीखा जवाब देते हुए न केवल सैन्य ठिकानों, बल्कि दूतावासों और तेल-गैस के बुनियादी ढांचे को भी निशाना बनाया है। इसके साथ ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण Strait of Hormuz पर भी असर पड़ा है, जिससे वैश्विक आपूर्ति और बाजारों पर दबाव बढ़ गया है।
क्षेत्र में मौजूद 13 अमेरिकी सैन्य ठिकानों में से कई गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और कुछ तो अब रहने योग्य भी नहीं बचे। कुवैत स्थित ठिकानों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। पोर्ट शुएबा पर हुए हमले में छह अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई और एक टैक्टिकल ऑपरेशंस सेंटर पूरी तरह तबाह हो गया।
इसके अलावा, अली अल सलेम एयर बेस, कतर का अल उदीद एयर बेस, बहरीन में अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट मुख्यालय और सऊदी अरब का प्रिंस सुल्तान एयर बेस भी हमलों की चपेट में आए, जहां संचार प्रणालियों और सैन्य उपकरणों को भारी नुकसान पहुंचा।
Pentagon ने स्वीकार किया है कि भारी हवाई हमलों के बावजूद ईरान की सैन्य क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने कहा कि सुरक्षा के कई स्तर मौजूद हैं, लेकिन उन्हें और मजबूत करने की जरूरत है।
कुछ सैन्य अधिकारियों ने यह भी माना कि शुरुआती योजना में कमी रही और ईरान की ताकत का सही आकलन नहीं किया गया। युद्ध से पहले क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी दूतावासों और ठिकानों पर कर्मचारियों की संख्या कम नहीं की गई, जिससे जोखिम बढ़ा।
विशेषज्ञों का मानना है कि सैनिकों को बिखेरने से सैन्य अभियान चलाना और अधिक कठिन हो गया है। अमेरिकी वायुसेना के सेवानिवृत्त विशेषज्ञों के अनुसार, अस्थायी ठिकानों से आधुनिक युद्ध संचालन करना बेहद चुनौतीपूर्ण है और इससे रणनीतिक समन्वय पर भी असर पड़ता है।
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