शाहाबाद क्षेत्र के गाँव गुजीदेई से हुई गुझिया की शुरुआत: इतिहास और जनश्रुति के बीच शोध का विषय

Monday, March 2, 2026 - 12:47
Updated: 5 months ago
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शाहाबाद क्षेत्र के गाँव गुजीदेई से हुई गुझिया की शुरुआत: इतिहास और जनश्रुति के बीच शोध का विषय

हरदोई (आरएनआई) उप्र के जनपद हरदोई से होली का शुभारंभ होने के साथ होली की पारम्परिक मिठाई गुझिया का उदगम जिले के एक गाँव से हुई है। तहसील शाहाबाद क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में होली के पारंपरिक मिष्ठान गुझिया को लेकर एक रोचक जनश्रुति प्रचलित है, जिसके अनुसार इसकी शुरुआत गुजीदेई गाँव से मानी जाती है। स्थानीय मान्यता है कि गुजीदेई गाँव का नाम गजुआ दानव के नाम पर पड़ा और होली पर गुझिया चढ़ाने की परंपरा भी यहीं से प्रारंभ हुई। बुजुर्गों के अनुसार प्राचीन काल में गजुआ दानव अपने दो भाइयों के साथ इस क्षेत्र में निवास करते थे और समय के साथ लोकदेवता के रूप में पूजे जाने लगे। परेली ग्राम पंचायत के मजरा कुर्सेली में गजुआ दानव का स्थान आज भी आस्था का केंद्र है, जहाँ चैत्र शुक्ल तृतीया को मेला लगता है। कुर्सेली निवासी लगभग 88 वर्षीय टीकाराम और बलराम पुत्र लोचन बताते हैं कि यह क्षेत्र का सबसे पहला मेला माना जाता है और पीढ़ियों से आयोजित होता आ रहा है। वही परेली गाँव मे भगेल नाला किनारे गहनहा बाबा रूप में आज भी स्थान मौजूद है। वही ककरहा बाबा का स्थान मुरीदापुर गाँव स्थित फ्लोर मिल के पीछे पूर्ब मे स्थित है। मुरीदापुर निवासी 91 वर्षीय वालेश्वर अग्निहोत्री के अनुसार होली पर नया और पुराना अन्न मिलाकर गुझिया बनाई जाती थी और सबसे पहले होलिका दहन से पूर्व पूजा में अर्पित की जाती थी, उसके बाद ही घरों में गुझिया बनाने की परंपरा शुरू होती थी। साथ ही चैत्र और आषाढ़ पूर्णिमा को दानव स्थलों पर गुलगुला चढ़ाने की भी परंपरा रही है। स्थानीय बुजुर्ग राही गाँव के प्राचीन खेड़े को दानव किले के अवशेष के रूप में देखते हैं, जो इस क्षेत्र में दानव परिवार के प्रभाव और लोकविश्वास की ऐतिहासिक गहराई की ओर संकेत करता है। वहीं कुछ इतिहासकार गुझिया की लोकप्रियता को मध्यकालीन काल और मुगल काल के दौर की शाही रसोई से जोड़ते हैं, जहाँ इसे विशेष व्यंजन के रूप में परोसा जाता था। हालांकि गुजीदेई से जुड़े लोकविश्वास और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच ठोस प्रमाणों का अभाव है, ऐसे में यह विषय फिलहाल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शोध का विषय बना हुआ है, जो स्थानीय परंपरा और व्यापक इतिहास के संगम की ओर संकेत करता है तथा यह भी दर्शाता है कि गुझिया यहाँ केवल एक मिष्ठान नहीं, बल्कि लोकआस्था और क्षेत्रीय सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

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Laxmi Kant Pathak

Senior Journalist | State Secretary, U.P. Working Journalists Union (Regd.)

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