चटगांव हिल ट्रैक्ट्स: क्या पूर्वोत्तर भारत के लिए उभरती सुरक्षा चुनौती?

नव ठाकुरीया

Saturday, March 7, 2026 - 20:02
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दक्षिण बांग्लादेश का चटगांव हिल ट्रैक्ट्स (सीएचटी) क्षेत्र, जो भारत के त्रिपुरा, मिजोरम और असम की सीमाओं से सटा है, आज पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर रहा है। क्या यह इलाका बांग्लादेश, म्यांमार के अराकान राज्य और उत्तर–पूर्व भारत से जुड़े विभिन्न हथियारबंद समूहों के लिए धीरे-धीरे एक मंच बनता जा रहा है?

इसके साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि क्या भारत सरकार सीएचटी में रहने वाले मूल पहाड़ी समुदायों की समस्याओं को केवल बांग्लादेश का आंतरिक मामला मानकर अनदेखा करती रहेगी। 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में हुए चटगांव हिल ट्रैक्ट्स शांति समझौते का पूर्ण कार्यान्वयन आज भी अधूरा है, जिसके कारण चकमा सहित कई आदिवासी समुदायों में असंतोष बना हुआ है।

हाल ही में गुवाहाटी में आयोजित एक सम्मेलन ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया। ऑल इंडिया चकमा स्टूडेंट्स यूनियन (AICSU) की तीसरी वार्षिक बैठक 6–7 मार्च 2026 को शिल्पग्राम स्थित नॉर्थ ईस्ट जोन कल्चरल सेंटर (NEZCC) में आयोजित हुई। सम्मेलन में शिक्षाविदों, अधिवक्ताओं, पत्रकारों और छात्र नेताओं ने सीएचटी की मौजूदा स्थिति तथा वहां के पहाड़ी समुदायों के मानवाधिकारों से जुड़े प्रश्नों पर गंभीर चर्चा की।

वक्ताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि शांति समझौते पर हस्ताक्षर के लगभग तीन दशक बाद भी चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी है। समझौते ने भले ही दो दशक लंबे सशस्त्र संघर्ष को औपचारिक रूप से समाप्त किया हो, लेकिन न्याय, वास्तविक स्वायत्तता और भूमि अधिकारों से जुड़े कई वादे आज भी अधूरे हैं।

आज भी इस क्षेत्र में भारी सैन्य उपस्थिति, भूमि विवाद, कमजोर नागरिक संस्थाएं और मानवाधिकार उल्लंघन जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। चूंकि यह इलाका भारत और म्यांमार की सीमाओं से लगा एक संवेदनशील भू-राजनीतिक क्षेत्र है, इसलिए यहां की अस्थिरता का प्रभाव व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है।

AICSU के अध्यक्ष दृश्य मुनि चकमा का कहना है कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति स्थिर और शांतिपूर्ण पड़ोस को प्राथमिकता देती है, ताकि मानव तस्करी, अवैध आव्रजन, उग्रवादी नेटवर्क और बाहरी रणनीतिक हस्तक्षेप जैसे खतरों को रोका जा सके। यदि सीएचटी में प्रशासनिक शून्यता या हिंसा की स्थिति बनी रहती है, तो इसका लाभ गैर-राज्य तत्व या क्षेत्रीय भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धी उठा सकते हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र संवेदनशील रहा है। भारत के विभाजन के समय चटगांव इलाके में लगभग 95 प्रतिशत आबादी गैर-मुस्लिम थी, लेकिन इसे पूर्वी पाकिस्तान में शामिल कर दिया गया। इसके बाद 1960 के दशक में कप्ताई बांध परियोजना के कारण हजारों पहाड़ी परिवारों को विस्थापित होना पड़ा। विभिन्न आकलनों के अनुसार इस परियोजना से लगभग एक लाख लोग प्रभावित हुए, जिनमें से कई परिवार त्रिपुरा सीमा पार कर भारत में आ बसे।

1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के बाद आदिवासी नेताओं ने स्वायत्तता की मांग उठाई, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया। इसके बाद बड़ी संख्या में भूमि-विहीन बंगाली मुस्लिम आबादी को चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में बसाया गया और उनकी सुरक्षा के लिए सेना की तैनाती बढ़ाई गई। इससे स्थानीय पहाड़ी समुदायों में असंतोष बढ़ा और धीरे-धीरे यह आंदोलन सशस्त्र संघर्ष में बदल गया।

1977 से 1997 तक चले इस संघर्ष में 30 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए। परबत्य चटगांव जनसंहति समिति (PCJSS) की सशस्त्र शाखा ‘शांति वाहिनी’ और बांग्लादेशी सुरक्षा बलों के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा। अंततः 2 दिसंबर 1997 को शेख हसीना की सरकार और पीसीजेएसएस के बीच शांति समझौता हुआ, जिसने सशस्त्र आंदोलन को समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया।

हालांकि इस समझौते के तहत पहाड़ी समुदायों को कुछ सांस्कृतिक अधिकार और सीमित स्वायत्तता देने का प्रावधान था, लेकिन स्थानीय समुदाय आज भी इसके पूर्ण क्रियान्वयन की मांग कर रहे हैं। बौद्ध, हिंदू और अन्य जातीय समुदाय अपने क्षेत्रों में भूमि अधिकार, सुरक्षा और अधिक प्रशासनिक स्वायत्तता चाहते हैं।

गुवाहाटी सम्मेलन के एक सत्र में यह भी चर्चा हुई कि यदि सीएचटी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है, तो सीमापार जातीय संबंधों के कारण वहां के लोग पूर्वोत्तर भारत में शरण लेने को मजबूर हो सकते हैं। साथ ही यह आशंका भी व्यक्त की गई कि यदि इस क्षेत्र में उग्रवादी गतिविधियां दोबारा बढ़ती हैं—जिनमें रोहिंग्या से जुड़े आतंकी संगठनों या कुछ भारत-विरोधी तत्वों की भूमिका शामिल हो—तो इससे पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा स्थिति प्रभावित हो सकती है।

सम्मेलन के इस सत्र का संचालन AICSU के पूर्व अध्यक्ष श्यामल विकास चकमा ने किया। इसमें डॉ. अनुराग चकमा, डॉ. अंकिता दत्ता, नरेश चकमा, अधिवक्ता कुलदीप बैश्य सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। चर्चा में रंगमती, खगराचारी और बंदरबन जिलों में स्थापित जिला परिषदों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए, जहां लंबे समय से नियमित चुनाव नहीं हुए हैं।

वक्ताओं का मानना था कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए चटगांव हिल ट्रैक्ट्स समझौते का पूर्ण और पारदर्शी क्रियान्वयन आवश्यक है। साथ ही स्थानीय समुदायों को भी अपने अधिकारों की लड़ाई को लोकतांत्रिक और परिपक्व तरीकों से आगे बढ़ाने की जरूरत है।

(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

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