करेरा में रेत माफिया का तांडव प्रशासन की कार्रवाई पर भी सवाल

Tuesday, January 13, 2026 - 22:20
Updated: 7 months ago
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करेरा में रेत माफिया का तांडव प्रशासन की कार्रवाई पर भी सवाल

शिवपुरी (आरएनआई) करेरा अंचल आज अवैध रेत खनन की उसी आग में जल रहा है जिसमें प्रशासन की चुप्पी घी का काम कर रही है। नदियों और नालों का सीना दिनदहाड़े चीरा जा रहा है, जेसीबी मशीनें बेखौफ गरज रही हैं, ओवरलोड ट्रैक्टर ट्रॉली ,डंपर सड़कों पर मौत बनकर दौड़ रहे हैं और अफसरों के दफ्तरों तक शिकायतें पहुंचकर भी धूल फांक रही हैं। यह कोई अचानक पैदा हुआ संकट नहीं है। यह लंबे समय से चल रही वह व्यवस्था है जिसमें माफिया का नेटवर्क मजबूत होता गया और सरकारी तंत्र अपनी रीढ़ खोता गया।

शनिवार को जब करेरा एसडीएम अनुराग निंगवाल के नेतृत्व में दिनारा थाना क्षेत्र के ग्राम छितीपुर नाले पर कार्रवाई हुई तो तस्वीर एक पल के लिए बदली जरूर। एक जेसीबी जब्त हुई, करीब 100 ट्रॉली अवैध रूप से भंडारित रेत जब्त की गई और मशीन थाना दिनारा के सुपुर्द कर दी गई। कागजों में यह बड़ी कार्रवाई है, लेकिन जमीन पर इसी बड़ी कार्रवाई ने एक और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि यह सख्ती सच में सख्ती थी या सिर्फ दिखावा।

स्थानीय लोगों और मौके के सूत्रों की बात सच मानें तो असली कहानी यही है कि मौके पर एक नहीं बल्कि चार जेसीबी थीं। चर्चा है कि शुरुआती तौर पर चारों को जब्त किया गया, फिर कुछ ही देर में किसी प्रभावशाली का फोन आया और तीन जेसीबी छोड़ दी गईं। यदि यह सच है तो प्रशासन के माथे पर सीधा धब्बा है। क्योंकि फिर यह कार्रवाई माफिया के खिलाफ नहीं बल्कि जनता की आंखों में धूल झोंकने वाली कार्रवाई बन जाती है। सवाल साफ है कि तीन मशीनें किसके दबाव में छोड़ी गईं, किसके आदेश पर छोड़ी गईं और किन शर्तों पर छोड़ी गईं।

करेरा, मचावली, छितीपुर, दिनारा, आमोलपठा और आसपास के नालों में महीनों से अवैध उत्खनन की शिकायतें हैं। रात होते ही जेसीबी मैदान में उतर आती हैं और सुबह होने से पहले रेत ठिकानों तक पहुंच जाती है। यह सिर्फ पर्यावरणीय अपराध नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों के हिस्से की जमीन, पानी और जीवन की लूट है। नदी नालों का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ रहा है, भूजल स्तर पर संकट गहरा रहा है, खेती की नमी खत्म हो रही है और पेयजल की व्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है। फिर भी कार्रवाई जितनी दिखती है उतनी होती नहीं और जहां होती है वहां पूरी नहीं होती।

एक जेसीबी की जब्ती और सौ ट्रॉली रेत की बरामदगी मामूली बात नहीं है, लेकिन जब गांव गांव में लोग जानते हैं कि खेल किन हाथों में है तब आधी कार्रवाई आधा सच बनकर सामने आती है। माफिया का मनोबल इसलिए बढ़ता है क्योंकि उसे भरोसा है कि सिस्टम का एक हिस्सा उसके साथ है या कम से कम उसके खिलाफ नहीं है। और यह भरोसा बिना संरक्षण के पैदा नहीं होता।

अब प्रशासन के पास दो रास्ते हैं। पहला कुछ दिन का शोर, एक दो फोटो, एक दो पंचनामा और फिर वही खामोशी और वही रात का खनन। दूसरा ईमानदार, निर्भीक और निरंतर कार्रवाई जिसमें फोन नहीं चले, कानून चले। जिसमें मशीनें छोड़ने की नहीं बल्कि मशीनों पर सख्त कार्रवाई हो। जिसमें सिर्फ चालक नहीं बल्कि मालिक और संरक्षण देने वाले चेहरे भी कटघरे में हों। जिसमें जब्ती के साथ साथ संपत्ति कुर्की, भारी जुर्माना, केस की तेज पैरवी और जवाबदेही तय हो।

> करेरा की जनता अब कार्रवाई नहीं, नतीजा चाहती है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि तीन जेसीबी छोड़ने की चर्चाओं में कितना सच है। यदि सच है तो वह फोन किसका था। क्योंकि करेरा की नदियों पर अब रेत नहीं, सवाल बह रहे हैं। यदि इन सवालों का जवाब नहीं मिला तो यह मानना पड़ेगा कि करेरा में रेत माफिया नहीं, सिस्टम की कमजोरी राज कर रही है। और जब सिस्टम कमजोर पड़ता है तो माफिया सिर्फ रेत नहीं निकालता, वह शासन की साख भी निकाल लेता है।

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