जातिगत जनगणना से बदलेंगे सियासी समीकरण: आबादी का गणित तय करेगा सत्ता का भविष्य
नई दिल्ली (आरएनआई)। देश में होने वाली अगली जनगणना अब महज आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह भविष्य की राजनीति और नीतियों की दिशा तय करने वाला बड़ा मोड़ साबित हो सकती है। खास तौर पर यदि इसमें जातियों और उपजातियों के सटीक आंकड़े सामने आते हैं, तो सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है और “जिसकी जितनी आबादी, उतना हिस्सा” का नारा और मजबूत हो सकता है।
भारत में जाति और राजनीति का रिश्ता नया नहीं है, लेकिन अब तक अधिकांश नीतियां पुराने अनुमानों पर आधारित रही हैं। आखिरी बार 1931 में जातिगत आधार पर विस्तृत जनगणना हुई थी, जिसके बाद से सरकारों ने इस विषय से दूरी बनाए रखी। इसके बावजूद, राजनीतिक रणनीतियां हमेशा जातिगत समीकरणों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही हैं।
1979 में गठित मंडल आयोग ने भी 1931 के आंकड़ों को आधार बनाकर अपनी सिफारिशें दी थीं। 1990 के दशक में जब इन सिफारिशों को लागू किया गया, तो देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और पिछड़ा वर्ग केंद्र में आ गया। अब एक बार फिर उसी तरह की बहस तेज हो रही है, जिसमें आबादी के अनुपात के आधार पर अधिकार और हिस्सेदारी की मांग उठ रही है।
हाल के वर्षों में बिहार में कराए गए जाति सर्वेक्षण ने इस बहस को और धार दी है। सर्वे में पिछड़े और अति-पिछड़े वर्ग की बड़ी आबादी सामने आने के बाद अन्य राज्यों में भी ऐसी मांग तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए इसी आधार पर रणनीतियां बनाई जा रही हैं।
नई जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद सबसे बड़ा मुद्दा आरक्षण की सीमा को लेकर खड़ा हो सकता है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय की हुई है, लेकिन यदि आबादी के नए आंकड़े इस सीमा से अधिक हिस्सेदारी की मांग को मजबूत करते हैं, तो इसे बढ़ाने की बहस तेज होना तय है।
हालांकि जातिगत जनगणना अपने साथ कई चुनौतियां भी लेकर आती है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसी व्यक्ति द्वारा बताई गई जाति की पुष्टि कैसे की जाएगी। अलग-अलग राज्यों में एक ही जाति की अलग सामाजिक स्थिति भी इस प्रक्रिया को जटिल बनाती है। इसके अलावा उपजातियों की बड़ी संख्या और उनकी सही पहचान दर्ज करना भी एक कठिन कार्य है।
स्पष्ट है कि आने वाली जनगणना देश की सामाजिक और राजनीतिक संरचना पर गहरा असर डाल सकती है। यह केवल आंकड़ों का संकलन नहीं, बल्कि सत्ता, संसाधनों और प्रतिनिधित्व के नए संतुलन की आधारशिला बन सकती है। अब नजर इस बात पर है कि क्या ये आंकड़े भारतीय राजनीति के समीकरणों को स्थायी रूप से बदल देंगे।
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