‘गूगल बना नया पंडा’: मथुरा-वृंदावन की बदलती पहचान पर चिंतन
मथुरा (आरएनआई) मथुरा और वृंदावन की बदलती सामाजिक और सांस्कृतिक तस्वीर को लेकर लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी ने गहरी चिंता जताई है। उनका कहना है कि बीते 50–60 वर्षों में इस धार्मिक नगरी की पहचान में बड़ा बदलाव आया है, जहां परंपरा और स्थानीय संस्कृति की जगह अब डिजिटल और ‘ग्लोबल’ प्रभाव हावी होता जा रहा है।
लेख के अनुसार, पहले मथुरा की पहचान उसके मोहल्लों, घाटों और मंदिरों से जुड़ी सामाजिक जीवनशैली से होती थी, जहां लोगों के बीच गहरा संवाद और जुड़ाव था। लेकिन अब नई कॉलोनियों, बढ़ते शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने लोगों को एक-दूसरे से दूर कर दिया है। मंदिरों में स्थानीय लोगों की भागीदारी कम हुई है और उनकी जगह बाहरी पर्यटकों की भीड़ बढ़ी है।
लेखक का मानना है कि आज के दौर में धार्मिक स्थलों की लोकप्रियता भी काफी हद तक इंटरनेट और प्रचार पर निर्भर हो गई है। बांके बिहारी मंदिर जैसे प्रमुख स्थलों पर भारी भीड़ रहती है, जबकि ऐतिहासिक और स्थापत्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण मंदिर अपेक्षाकृत खाली रहते हैं। इस बदलाव को वह ‘गूगल पंडा’ की अवधारणा से जोड़ते हैं, जहां श्रद्धालु अपनी आस्था और यात्रा का मार्गदर्शन इंटरनेट के आधार पर तय कर रहे हैं।
लेख में यह भी कहा गया है कि मथुरा की पारंपरिक धार्मिक संस्कृति धीरे-धीरे प्रतीकात्मक बनती जा रही है, जबकि व्यवहारिक जीवन में आधुनिकता और उपभोक्तावाद का प्रभाव बढ़ रहा है। पहले जहां लोग ‘भक्त’ थे, अब वे ‘उपभोक्ता’ बनते जा रहे हैं। नई पीढ़ी का मंदिरों और परंपरागत कार्यों से जुड़ाव भी कम हो रहा है।
इस बदलाव के साथ समाज में मिश्रित संस्कृति, बाजारवाद और आधुनिक जीवनशैली का प्रभाव तेजी से बढ़ा है, जिससे पारंपरिक सामाजिक ढांचे और मूल्यों में बदलाव देखने को मिल रहा है। लेखक के अनुसार, मथुरा अब एक ऐसा शहर बनता जा रहा है जो बाहर से तो वैश्विक संस्कृति से जुड़ा है, लेकिन अपनी जड़ों और परंपराओं से दूर होता जा रहा है।
यह लेख मथुरा की बदलती पहचान, संस्कृति और समाज पर एक गंभीर मंथन प्रस्तुत करता है, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन के सवाल को सामने लाता है।
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