ओडिशा में जुटे 24 देशों के जगन्नाथ भक्त, इस्कॉन की रथयात्रा को लेकर वैश्विक जागरूकता का संकल्प
पुरी (आरएनआई)। ओडिशा के पुरी में आयोजित एक वैश्विक सम्मेलन में भगवान जगन्नाथ के भक्तों ने इस्कॉन द्वारा विदेशों में शास्त्रों से हटकर असमय रथयात्रा आयोजित किए जाने पर गहरी आपत्ति जताते हुए इसके खिलाफ दुनिया भर में जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया है। तीन दिवसीय यह सम्मेलन श्री जगन्नाथ चिंतन और चेतना वर्ल्डवाइड (एसजेसीसीडब्ल्यू) की ओर से आयोजित किया गया, जिसमें 24 से अधिक देशों से श्रद्धालु शामिल हुए।
सम्मेलन का उद्घाटन पुरी के शंकराचार्य ने किया, जबकि पुरी के गजपति महाराजा दिब्यसिंह देव ने इसे संबोधित किया। SJCCW के ट्रस्टी भगवन पांडा ने कहा कि हिंदू शास्त्रों और पुराणों के विरुद्ध जाकर विदेशों में रथयात्रा आयोजित किया जाना आस्था और परंपरा दोनों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर विश्व स्तर पर जनजागरूकता अभियान चलाया जाएगा, ताकि भगवान जगन्नाथ की परंपराओं की रक्षा की जा सके।
जापान से आए प्रतिनिधि कालिंदी त्रिपाठी ने भी इस मुद्दे पर कहा कि किसी भी देश में रथयात्रा आयोजित करने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसका आयोजन शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार ही होना चाहिए। उनके अनुसार, आस्था के साथ-साथ धार्मिक मर्यादाओं का पालन भी उतना ही आवश्यक है।
यह मुद्दा लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। 12वीं शताब्दी के पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर का प्रबंधन और मायापुर स्थित इस्कॉन इस बात पर कई वर्षों से आमने-सामने हैं। इस्कॉन का तर्क रहा है कि वैश्विक स्तर पर एक ही तिथि पर रथयात्रा कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है, जबकि पुरी मंदिर प्रबंधन इसे शास्त्रों के विरुद्ध मानता है।
सभा को संबोधित करते हुए गजपति महाराजा, जो श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष भी हैं, ने इस्कॉन के रुख पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया के दिन ही रथयात्रा होनी चाहिए और इससे अलग कोई भी आयोजन सनातन परंपरा के खिलाफ है।
गजपति महाराजा ने पश्चिम बंगाल के दीघा में बने जगन्नाथ मंदिर को ‘जगन्नाथ धाम’ कहे जाने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि ‘धाम’ का दर्जा केवल पुरी को ही प्राप्त है, क्योंकि भगवान जगन्नाथ मूल रूप से वहीं विराजमान हैं। दीघा का मंदिर पुरी मंदिर की प्रतिकृति के रूप में बनाया गया है और उसका प्रबंधन इस्कॉन के पास है, लेकिन उसे धाम कहना धार्मिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है।
इस सम्मेलन के जरिए भक्तों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भगवान जगन्नाथ की परंपराओं और शास्त्रीय मर्यादाओं की रक्षा के लिए वैश्विक स्तर पर एकजुट होकर आवाज उठाई जाएगी।
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