मथुरा की राजनीति: गठबंधन कागजों पर, जमीनी हकीकत कुछ और
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) प्रदेश स्तर पर गठबंधन में हैं। कागजों पर दोनों दल साथ दिखाई देते हैं, लेकिन मथुरा जिले की पांचों विधानसभा सीटों की राजनीतिक तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। यहां जमीनी स्तर पर दोनों दलों के कई नेताओं के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और आपसी मतभेद लगातार देखने को मिलते हैं।
मांट विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के राजेश चौधरी और आरएलडी के योगेश नौहवार के बीच लंबे समय से राजनीतिक खींचतान बनी हुई है। दोनों नेताओं के बीच समय-समय पर होने वाली बयानबाजी गठबंधन की भावना के विपरीत दिखाई देती है।
छाता विधानसभा सीट पर भी भाजपा के लक्ष्मी नारायण चौधरी और आरएलडी के तेजपाल सिंह अक्सर एक-दूसरे पर राजनीतिक हमले करते रहते हैं। वहीं गोवर्धन विधानसभा क्षेत्र में आरएलडी के जिला अध्यक्ष प्रीतम सिंह लगातार अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा रहे हैं। माना जा रहा है कि वह आगामी विधानसभा चुनाव गोवर्धन से लड़ना चाहते हैं, ऐसे में भाजपा विधायक मेघश्याम सिंह पर उनके हमले भी तेज हो गए हैं।
बलदेव विधानसभा क्षेत्र में भी भाजपा के पूरण प्रकाश और आरएलडी के रोहित प्रताप के बीच रिश्ते सामान्य नहीं माने जाते। कुल मिलाकर जिले में गठबंधन ऊपर से मजबूत दिखता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर दोनों दलों के नेताओं के बीच मतभेद अक्सर सामने आते रहते हैं।
हालांकि, मथुरा विधानसभा सीट पर अभी तक आरएलडी की ओर से कोई बड़ा दावेदार खुलकर सामने नहीं आया है। अंतिम फैसला भाजपा और आरएलडी के शीर्ष नेतृत्व को ही करना है और चुनावी रणनीति समय के साथ तय होगी।
इन राजनीतिक समीकरणों के बीच सबसे बड़ा सवाल जनता से जुड़ा है। क्या केवल गठबंधन या पार्टी बदलने से किसी क्षेत्र की समस्याओं का समाधान हो जाता है? उदाहरण के तौर पर यदि छाता से लक्ष्मी नारायण चौधरी की जगह तेजपाल सिंह विधायक बन जाएं, तो क्या इससे क्षेत्र की मूल समस्याएं स्वतः समाप्त हो जाएंगी? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जनता को उम्मीदवार का मूल्यांकन उसके काम के आधार पर करना चाहिए।
छाता की वर्षों से बंद पड़ी चीनी मिल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। तेजपाल सिंह अक्सर इस मुद्दे पर लक्ष्मी नारायण चौधरी को घेरते हैं, लेकिन यह भी सवाल उठता है कि जब वह स्वयं विधायक थे, तब इस मिल को शुरू कराने के लिए उन्होंने क्या ठोस प्रयास किए।
दूसरी ओर, लक्ष्मी नारायण चौधरी लगातार दो कार्यकाल तक उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। दूसरे कार्यकाल में उनके पास गन्ना विभाग जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय भी था, लेकिन इसके बावजूद अपने ही क्षेत्र की चीनी मिल शुरू नहीं हो सकी। जबकि केंद्र सरकार लगातार एथनॉल उत्पादन और गन्ना आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की बात करती रही है। यदि किसानों को स्थानीय स्तर पर गन्ने की खरीद और चीनी मिल चलने का भरोसा नहीं मिलेगा, तो गन्ने की खेती को बढ़ावा कैसे मिलेगा?
लोकतंत्र में चुनाव केवल दलों की जीत-हार का माध्यम नहीं है, बल्कि जनता के भविष्य का फैसला भी होता है। इसलिए मतदाताओं को केवल चुनाव चिन्ह या गठबंधन देखकर नहीं, बल्कि उम्मीदवार की ईमानदारी, कार्यक्षमता और क्षेत्र के लिए किए गए कार्यों के आधार पर मतदान करना चाहिए।
एक सक्षम विधायक विधानसभा में अपने क्षेत्र की समस्याओं को मजबूती से उठा सकता है। लेकिन यदि चुना गया जनप्रतिनिधि सरकार के सामने अपने क्षेत्र के मुद्दे प्रभावी ढंग से नहीं रख पाएगा, तो केवल सत्ता पक्ष का हिस्सा होने से जनता की समस्याओं का समाधान संभव नहीं होगा। लोकतंत्र में जनता की आवाज उठाने वाला प्रतिनिधि ही वास्तव में क्षेत्र के विकास की दिशा तय करता है।
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